शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय पटल ] [ ५१ हो उसी को अपने शिष्य के रूप में ग्रहण करना चाहिए और शुभ की आकाङ्क्षा से भी अन्य को कभी ग्रहण न करे ॥१५०॥ मन्त्रपूजारहस्यानि यो गोपयति सर्वदा । त्रिकालं यो नमस्कुर्यादागमाचारतत्ववित् ॥१५१ स एव शिष्यः कर्तव्यो नेतर' स्वल्पजीवनः । एतादृशगुणोपेतः शिष्यो भवति नापरः ॥१५२ एकाब्देन भवेद्योग्यो ब्राह्मणोऽब्दद्वयान्नृपः । वैश्यो वर्षैस्त्रिभिः, शूद्रश्चतुर्भिर्वत्सरैर्गुरोः । स शुश्रूषुः परिग्राह्यो दीक्षायागव्रतादिषु ॥१५३ जो मन्त्र-पूजा के रहस्यों का सदा गोपन किया करता है और आचारों के तत्वों का ज्ञाता तीनों कालों में नमस्कार करे । वही अपना शिष्य बनानाचाहिए और दूसरेस्वल्प जीवन वालेको शिष्य न करे । इस प्रकार के गुणों से सयुत ही शिष्य होता है और अन्य नहीं होता है । १५१-१५२। ब्राह्मण एक वर्ष में योग्य होता है । दो वर्षमें क्षत्रिय तीन वर्षों में वैश्य और शूद्र चार वर्षों में योग्य होता है । ऐसा ही गुरु को दीक्षा-याग और व्रतादि में सुश्रुषु शिष्य ग्रहण करने योग्य है ॥१५३। तृतीय पटल ततो वक्ष्यामि दीक्षाङ्गं वास्तुयागपुरःसरम् । कृतेग येन मन्त्रज्ञो दीक्षायाः फलमश्नुते ॥१ राक्षस वास्तुनामानं हत्वाधिष्ठाय तत्तनुम् । स्थितास्त्रिपञ्चाशद्देवास्तेभ्यः पूर्वं वलि हरेत् ॥२ वलिमण्डलमेतेषां यथावदभिसीयते । पूर्वापरायतं सूत्रं विन्यसेदुक्तमानतः ॥३