शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय पटल ] [ ४६ आयतन, समुद्र का तट और अपना गृह ये मन्त्रधारियों को साधन के लिए स्थान, प्रशस्त हुआ करते हैं । भिक्षा से प्राप्त अन्न-हविष्य, शाक-फलऔर दूध, मूल, यवों, का बनाया हुआ सक्तुये ही मन्त्रधारियों के भक्ष्य होते हैं । पुरुषार्थ की समाप्ति के लिए अच्छे विषय को गुरुका समाश्रय ग्रहण करना चाहिए ।१३८-१४१। मातृतः पितृतः शुद्धः शुद्धभावो जितेन्द्रियः । सर्वागमानां सारज्ञः सर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित् ।१४२ परोपकारनिरतो जपपूजादितत्परः । अमोघवचनः शान्तो वेदवेदार्थपारगः ।१४३ योगमार्गानुसन्धायो देवताहृदयङ्गमः । इत्यादि गुणसम्पन्नो नुरुरागमसम्मतः । १४४ शिष्यः कुलीनः शुद्धात्मा पुरुषार्थपरायणः । अधीतवेदः कुशला दूरमुक्तमनोभवः । १४५ अब परम श्रेष्ठ गुरु के विषय में बतलाते हैं-मातृकुल और पितृ- कुल से शुद्ध होवे, विशुद्ध भाव से समन्वित होवे, इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने वाला होवे, सभी आगमों के सारका ज्ञाता होवे और समस्त शास्त्रों के अर्थों ;के तत्वों का जानने वाला होवे । दूसरों की भलाई करने में निरत रहने वाला होवे, जप और पूजा आदि में परायण रहने वाला होवे, अमोघ, वचनों को कहने वाला हो, परम शान्त होवे, वेदों के अर्थों का पारगामी विद्वान् होवे, योग मार्गके अनुसन्धान करने वाला होवे, देवता का हृदयङ्गम करने वाला होवे, इत्यादि सुसम्पन्न गुरु ही आगमोंके द्वारा सम्मत होता है । अब शिष्यके विषयमें बतलाता जाता है कि शिष्यकैसा होना चाहिए । शिष्य अच्छे कुलमें समुत्पन्नहुआ होवे, उसकी आत्मा सभी प्रकार के दोषोंसे रहित परम शुद्धि होनी चाहिए । शिष्य पुरुषार्थ करने में तत्पर रहने वाला होवे, उसने वेदों का अध्ययन किया हो और वह कार्य कुशल होना चाहिए । शिष्य ऐसा ही होना