भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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तृतीय पटल ] [ ५७ दक्षिण विधि-फिर चार कोष्ठों वाली पश्चिम विधि-और आठ कोष्ठों वाली उत्तर विधि का मार्जन करे । इस मण्डप में चतुष्कोष्ठ त्रय अव- शिष्ट रहता है । ३२। पदानि रञ्जयेत्तानि श्वेतपीतारुणासितैः । रजोभिः श्यामलेनाथ वीथीरापूरयेत्सुधीः । ३३ पात्राणि त्रिविधांयाहुरंकुरार्पणकर्मसु । पालिकाः पञ्च मुख्यश्च शरावाश्च चतुष्क्रमात् । ३४ प्रोक्ताः स्मृताः सर्वतन्त्रज्ञैर्हरिब्रह्मशिवात्मकाः । एषामुत्सेध (च्छाय) उन्नेयः षोडश द्वादशाष्टभिः । ३५ अंगुलैः क्रमशस्तानि शुभांयावेष्ट्य तंतुना । प्रक्षाल्य देशिकस्तेषु पदेष्वाहितशालिषु । ३६ सगन्धदर्भकूर्चेषु पश्चिमादि निवेशयेत् । करीषवालुकामृद्भिस्तानि पात्राणि पूरयेत् । ३७ उन पदों का श्वेत-पीत-अरुण और सितरज से तथा श्यामल रज से सुधी पुरुष को विधि पूर्वक अपूरित करना चाहिए । ३३। अंकुरा- र्पण कर्मों में तीन प्रकार के पात्र कहे गये हैं-पालिका-पाँच मुखी और शराव ये क्रम से बताये गये हैं । ये सभी तन्त्रों के ज्ञाताओं के द्वारा हरि ब्रह्मा और शिव के स्वरूप वाले कहे गये हैं । इनकी ऊँचाई क्रम से षोड्श-द्वादश और अष्ट अंगुलों की समझनी चाहिए । वे शुभ होती हैं । इनको तन्तु से आवेष्टित करके प्रक्षालन करके आचार्य आहित शाली वाले गन्ध दर्भ कूर्च से युक्त उन पदों के पश्चिम आदि निवेशित करना चाहिए । करीष बालुका-मृत्तिका से उन पात्रों को पूरित कर देवे । ३४-३७। सुधाबीजेन बीजानि दुग्धैः प्रक्षाल्य तन्त्रवित् । मूलमन्त्राभिजप्तानि पंचघोषपुरःसरम् । ३८ आशीर्वाग्भिर्द्विजातीनां मंगलाचारपूर्वकम् । निर्वपेत्तेषु पात्रेषु देशिको यतमानसः । ३६