भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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५६ ] [ श्रीशारदा तिलक के मान से तोरण में मध्य में शूलों को कल्पना करे ।२५। दिशाओ में लोक पालों के समान प्रभा वाली ध्वजाओं को बांध देवे । उस मण्डप को वितान-दर्भ और मालाये आदि के द्वारा भली-भांति समलंकत करना चाहिए ।२६। तत्तिभागमिते क्षेत्रेऽरत्निमात्रसमन्विताम् । चतुरस्रां ततो वेदि मण्डलाय प्रकल्पयेत् । २७ प्रागेव दीक्षादिवसात्सप्तभिर्विधिवहितैः । सर्वमङ्गलसम्पत्यै विदध्यादङ्कुरार्पणम् ।२८ मण्डपस्योत्तरे भागे शालां पूर्वापरायताम् । मूढां कुर्यात्ततस्तस्यां मण्डलं रचयेत्सुधीः । २६ पञ्चहस्तप्रमाणानि पञ्चसूत्राणि पातयेत् । पूर्वापरायतान्येषामन्तरं द्वादशांगु लम् ।३० दक्षिणोत्तासूत्राणि तद्वदेकादशार्पयेत् । पदानि तत्र जायन्ते चत्वारिंशत्प्रमार्जयेत् । ३१ षड्क्त्यावीथीश्चतस्रोऽतश्चतुष्कोभयपार्श्वयोः । वीथ्यौ द्वे च चतुष्कोष्ठत्रयमत्रावशिष्यते । ३२ उसके विभाग से परिमित क्षेत्र में अरत्नि मात्र से समन्वित चतु- रस्र वेदी मण्डल के लिए कल्पित करे ।२७। दीक्षादि दिवस से पहिले ही सात दिन में विधि के सहित सब प्रकार के मङ्गलों की सम्पत्ति के लिए अंकुरों का आरोपण करना चाहिए ।२८। मण्डप के उत्तर भाग में पूर्वापर में आयता गूढ़ डाला जनानी चाहिए । फिर उनके उपरान्त उस शाला में सुधी व्यक्ति को चाहिए कि मण्डप की रचना करे ।२६। फिर पाँच हाथों के प्रमाण वाले पाँच सूत्रों का पालन करे जो पूर्वा पर आयत हों वे और जिनका अन्तर बारह अंगुल होवे ।३०। उसी भाँति दक्षिण सूत्रों को ग्यारह वार करे । वहाँ पर चालीस पद उत्पन्न होते हैं उसकी प्रमार्जित करना चाहिए । ३१। पांकुम चारों विधियों का मार्जन करे । पूर्व से चार कोष्ठो वाली एकविधि आठ कोष्ठों वाली