भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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५८ ] [ श्री शारदा तिलक शालिश्यामाढकामुद्गतिलनिष्पावसर्षपाः । कुलत्थ कंगुमाषाश्च बीजान्यङ्.कुरर्मणि ।४० हरिद्रद्भि समभ्युक्ष्य वस्त्रैराच्छाद्य देशिकः । बलिंत्रिविधपात्राणां दिक्षु पूर्वादिंतोहरेत् ।४१ प्रणवाद्यैर्नमोन्तैश्च रात्रौ रात्रीशनामभिः । भतानि पितरो यक्षा नागा ब्रह्मा शिवो हरिः ।४२ तन्त्रों का ज्ञाता सुधा बीज के द्वारा बीजों को दूध से प्रक्षालित करके मूल मंत्र से अभिमंत्रित करे और पाँच घोषों के साथ-द्विजातियों के आशीर्बचनों से मङ्गलाचार पूर्वक आचार्य संयत मंत्र वाला होकर उन पात्रोंमें निर्वपन करे ।३८-३६। शाली, श्यामा, आढकी, मुद्ग, तिल, निष्पाव, सर्षप कुलत्थ कङ्गु, मास, इनके बीजों को अंकुर, कर्म्म में ग्रहण करना चाहिए । आचार्य हल्दी से सभ्युक्षण करके वस्त्रसे आच्छा- दित कर देवे । पूर्वादि दिशाओं में त्रिविध पात्रों की बलि का समाहरण करे ।४०-४१। यह बलि रात्रीशके नामों द्वारा देवे जिनके आदिमें प्रणव होवे और अन्त में नमः'–यह पद होवे । भूत, पित्रगण, यक्ष, नाग, ब्रह्मा, शिव ओर हरि ये सातों रात्रियों के देवता कहे गये हैं ।४२। सप्तानामपि रात्रीणां देवताः समुदीरिताः : भूतेभ्यः स्यलजतिलहरिद्रादधिसक्तवः ।४३ सान्नाः पितृभ्यः सतिलास्तण्डुलाः परिकीर्तिताः । करम्भलाजा यक्षेभ्यो नारिके लोदकान्वितम् ।४४ सक्तुपिष्टं च नागेभ्यो ब्रह्मणे पंकजाक्षताः । सापूपमन्नं शर्वाय विष्णवे च गुडौदनम् ।४५ ततो लोकेश्वरेश्भ्योऽपि वितरेद्विधिवत्बलिम् । दीक्षायामभिषेकेषु नववेश्मप्रवेशने ।४६ उत्सवेषु च संपत्यै (त्तौ) विदध्यादङ्कुरापंणम् । प्राक् प्रोक्ते मण्डपे बिद्वान्वेदिकाया बहिस्त्रिधा ।४७