शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय पटल ] [ ४५ अश्वत्थपल्लवैर्मन्त्रमभिषिञ्चेद्विशुद्धये । सञ्चिन्त्य मनसा मन्त्र ज्योतिर्मन्त्रेण निदहेत् ।११५ मन्त्रे मलत्रयं मन्त्री विमलीकरणं त्विदम् । तारं व्योमाग्निमनुयुक् दण्डी ज्योतिर्मनुमतः ।११६ कुशोदकेन जप्तेन प्रत्यर्णं (प्रत्येकं) प्रोक्षणं मनोः । तेन मन्त्रेण विधिवदेतदाप्यायनं मतम् ।१२० प्रत्येक को मन्त्रधारी ताड़न करे, ऐसा कहा गया है । मन्त्र को लिखकर मन्त्रधारी उसका करवीर के प्रसूतों से जो उस मन्त्र के अक्षरों की संख्या वाले होंवे उससे हनन करे उससे बोधन होता है । अपने तन्त्र में कथित विधान के द्वारा मन्त्रधारी पुरुष मन्त्रके वर्णों की संख्या से विशुद्धि के लिए अश्वत्थ के पत्तों के द्वारा अभिषिञ्जन करे, यही अभिषेक संस्कार होता है । मन के द्वारा मन्त्र का चिन्तन करके ज्योति मन्त्र के द्वारा निर्दग्ध करे जो कि मन्त्रमें तीन मल होते हैं-यही विमली करण मन्त्र का संस्कार होता है । व्योम अग्नि मन्त्रसे युक्त प्रणव और दण्डी, यही ज्योति मन्त्र कहा गया है । व्योम का अर्थ, हकार है । अग्नि का अर्थ रेफ है । मनुका तात्पर्य रो है । दण्डीका अर्थ अनुस्वार से युक्त होता है । अभिमन्त्रित किये हुए कुशोदक के द्वारा मन्त्र के प्रत्येक वर्ण का प्रोक्षण उस मन्त्र से विधि पूर्वक करे यही आप्यायन नामक संस्कार है ।११६-१२०। मन्त्रेण वारिणा मन्त्रे तर्पणं स्मृतम् । तारमा यारमायोगे मनोर्दीपनमुच्यते ।१२१ जप्यमानस्य मन्त्रस्य गोपनञ्च प्रकाशनम् । संस्कार दश संप्रोक्ताः सर्वमन्त्रेषु गोपिताः ।१२२ यान् कृत्वा संप्रदायेन मन्त्री वाञ्छितमश्नुते । स्वताराराशिकोष्ठानातनुकूलं भलंतमनुम् ।१२३ प्राप लोभात्पटु म्प्राज्यं रुद्रस्यात्र (द्वि) रुरुष्करम् । लोकलोपटु प्रायः खलौद्योभेषु भेदिताः ।१२४