शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय पटल ] [ ४३ गया है और यह सभी कर्मों में निन्दित माना गया है। चालीस से आरम्भ करके तिरेसठ वर्णों तक होवे तो इन संख्या वाले मंत्र सक्रीड़ संज्ञा वाले कहे गये हैं। जो मंत्र पैंसठ अक्षरों से संयुत होवे वे मंत्र शान्त मानस होते हैं। पैंसठ अक्षरों से लेकर एक कम सौ अक्षरों वाले जो मंत्र कहे गये हैं वे बुधों के द्वारा स्थान भ्रष्ट कहे गये हैं । जो मंत्र तेरह अक्षरों से युत है और पन्द्रह अक्षरों वाले हैं वे सब विकल कहे जाते हैं। शत (सौ) अथवा सार्धशत हों ।१०५-१०५। शतद्वयं द्विनवतिरेकहीनाथवापि सा । शतत्रयं वा यत्संख्या निः स्नेहास्ते समीरिताः ।१०६ चतुः शतान्यथारंभ्य यावद्वर्णसहस्रकम् । अतिवृद्धः संयोगेषु परित्याज्यः सदा बुधैः ।१०७ सहस्रावर्णाधिका मन्त्रा दण्डकाः पीडिताह्वयाः । द्विसहस्राक्षरा मन्त्राः खण्डशः शतधा कृताः ।१०८ ज्ञातव्या स्तोत्ररूपास्ते तन्त्र एते यथास्थिताः । तथाविधाश्च बोद्धव्या मन्त्रिभिः काम्य कर्मसु ।१०६ दोषानिमानविज्ञाय यो मन्त्रान् भजते जडः । सिद्धिर्न जायते तस्य कल्पकोटिशतैरपि ।११० दो-सौ-बानवें अथवा एक से हीन-अथवा तीन जो भी संख्या है, ऐसे मन्त्र निःस्नेह कहे गये हैं ।१०६। चार सौ से आरम्भ करके एक सहस्रवर्ण तक जो होते हैं वह संयोगों में अतिवृद्ध कहे गये हैं। बुधों को सदा ही उन्हें परित्याग कर देना चाहिए ।१०७। एक सहस्र वर्णों से भी अधिक वर्णों वाले मन्त्र दण्डक नाम से कहे गये है। यन्त्र पीड़ित नाम वाले होते हैं। दो सहस्र अक्षरों वाले मन्त्र खण्डशः सौ प्रकार से किये गये हैं। वे मन्त्र स्तोत्रों के ही रूप वाले समझने चाहिये । ये यथा स्थित हैं। उस भाँति वाले सब मन्त्र धारण करने वालों के द्वारा सभी कर्मों में समझ लेने चाहिए ।१०८-१०९। इन दोषों का ज्ञान प्राप्त