शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 43, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय पटल ] [ ३६ सप्तधा दृश्यते तं तु दग्धं मन्येत मन्त्रवित् । अस्त्रं द्वाभ्यां त्रिभिः षड्भिरष्टाभिर्दृश्यतेऽक्षरैः ।८० जो मन्त्र पाँच वर्णों वाला होवे और रेफ-इन्दु और अर्क से रहित होवे उसे नेत्रहीन समझना चाहिए। वह दुःख, शोक और भय के देने वाला हुआ करता है ।७६। आदि-मध्य और अवसान में चतुष्कल राव भी हो तथा माया और नमामि -यह पद जिसमें नहीं है वह कीलित कहा गया है । मध्य में एक-दो मूर्धा में जिसमें अस्त्र और पुरन्दर नहीं होते हैं वह मन्त्र स्तम्भित और सिद्धि का रोधक होता है । जिस मन्त्र के मूर्धा में वहिन वायु समायुक्त सात प्रकार से दिखलाई दिया करता है, मन्त्रों के ज्ञाता उस मन्त्र को दग्ध मानते हैं। जो दो से अस्त्र और तीन वकारों से ऐसे आठ से अक्षरों युक्त होता है ।७७-८०। त्रस्तः सोऽभिहितो यश्य मुखे न प्रणवः स्थितः । शिवो वा शक्तिरथवा भीताख्यः स प्रकीर्तितः ।८१ आदिमध्यावसानेषु भवेन्तार्र्णचतुष्टयम् । यस्य, मन्त्रः स मलिनो मन्त्रवित्त विवर्जयेत् ।८२ गरु मध्ये दकारोऽथ (वा) क्रोधो वा मूर्द्धनि द्विधाः । अस्त्रं तिष्ठति मन्त्रः स तिरस्कृत उदाहृतः ।८३ भ्योद्वयं हृदये शीर्षे वषठ् वौषट् च मध्यतः । यस्यासौ भेदितो मन्त्रस्त्याज्यः सिद्धिषु सूरिभिः ।८४ त्रिवर्णे हंसहीनो यः सुषुप्तः स उदाहृतः । मन्त्रो वाऽप्यथवाविद्या सप्ताधिकसताक्षरः ।८५ जिसके मुख में प्रणव स्थित नहीं होता है वह मन्त्र त्रस्त समझना चाहिए । शिव अथवा शक्ति न हो वह मन्त्र भीत कहा गया है ।८१। जिसके आदि—मध्य और अवसान में मार्णव चतुष्टय हो अर्थात् चार मवर्ण होवे वह मन्त्र मलिन होता है । मन्त्रों का ज्ञाता उसको वर्जित कर देवे ।८२। जिसके मध्य में हुँकार हो अथवा मूर्धा में क्रोध होवे और दो प्रकार से अस्त्र स्थित होता है वह मन्त्र तिरस्कृत कहागया है ।