शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 403, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तदश पटल ] [ ४०३ नीलप्रवालरुचिरं विलसच्चिनेत्रं पाशारुणोत्पलत्रिशूलहस्तम् । अर्द्धाम्बिकेशमनिशं प्रविभक्तभूषं । बालेन्दुबद्धमुकुट प्रणमापि रूपम् ।६० एकलक्षं जपेद्बीजमित्थ मन्त्री विचिन्तयेत् । अयुतं मधुना सिक्तैज्जुहुयात्तिलतण्डुलैः ।६१ अब चिन्तामणि मन्त्र का उद्धार करके बतलाया जाता है— अग्नि—रेफ, सम्वर्त्तक क्षः, आदित्य—मः र—स्वरूप, अनिल—यः, ओ-स्वरूप है । षष्ठ—ऊः, बिन्दु—अनुस्वार से युक्त होता है । यह चिन्तामणि—इस नाम से मन्त्र विख्यात है । यह बीज सब प्रकार की समृद्धि से युक्त होता है । ५७। अर्थात् सम्पूर्ण समृद्धि का दाता है । इसका ऋषि कश्यप है, छन्द अनुष्टुप् है—और इस मन्त्र का देवता जगतों के स्वामी भगवान् अर्द्धनारीश्वर कहे गये हैं । ५८। रेफादि छै व्यंजनों से इसके छै अङ्गों को क्रम से ही करना चाहिए ।५६। अब ध्यान बतलाया जाता है—नील प्रवाल के समान रुचिर तीन लोचनों से शोभित—करों में पाश—अरुणोत्पल, कपाल और त्रिशूल को धारण करने वाले-प्रकर्ष रूप से विभक्त भूषा से संयुत-बालचंद्र से बद्ध मुकट वाले, अम्बिका के स्वामी के रूप को निरन्तर प्रणाम करता हूँ । इस बीज का एक लाख जाप करे और मन्त्रधारी को इस प्रकार से ही ध्यान करना चाहिए । मधुसे सिक्त तिलों और तण्डुलोंके द्वारा इसकी दस हजार आहुतियाँ देकर होम करना चाहिए ।६१ शैवोदिते यजेत्पीठे प्रागङ्गैः षड्भिरीरितैः । वृषाद्यै र्मातृभिः पश्चाल्लोकपालैस्तदायुधैः ।६२ एवमभ्यर्चयेद्देवमर्द्ध नारीश्वरम् परम् । तेजः कान्तियशोलक्ष्मींवाचां भवति वल्लभः ।६३ प्रासादाद्यं जपेन्मन्त्रमयुतं रोगशान्तये । स्वरावृतमिदं बीज विगलत्परमामृतम् ।६४