भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 404

४०४ ] [ श्री शारदा तिलक चन्द्रविस्थितं मूर्द्धिन ध्यातं श्वेडगदापहम् । प्रतिलोमस्वरावीतं बीजं वहिनगृहे स्थितम् ॥६५ रेफादिव्यञ्जकोल्लासिषट्कोणाभिवृतं वहिः । भूतार्त्तन्य स्मृतं मूर्द्धिन भूतमाशु विनाशयेत् ॥६६ पूर्वोक्त शैव पीठ पर पूर्व में कथित छे अङ्गों के द्वारा यजन करे । इसके पश्चात् वृषादि मातृकाओं तथा आयुधों के सहित लोकपालों का अर्चन करे ।६२। इसी रीति से परम भगवान अर्द्धनारीश्वर का देवेश्वर का यजन करना चाहिये । ऐसा अर्चन करने वाला साधक तेज कान्ति, यश, लक्ष्मी और वाणी का वल्लभ हो जाया करता है ।६३। प्रासादय मन्त्र का दश हजार जाप रोगों की शान्ति के लिये करना चाहिये । यह वीज स्वरों से आवृत है और इस से परमामृत विगलत होता है ।६४। मूर्धा में चन्द्र विम्व को धारण करने वाले का ध्यान करे तो श्वेत गद का अपहरण करने वाला होता है । प्रतिलोम स्वरों से आवत बीज वहिनगृह मे स्थित है । ६५। रेफादि व्यञ्जनों से शोभित षट्को से बाहर अभिवृत होता है । जो भूतों से आर्त्त होवे उसके मूर्धा में स्मृत किये जाने पर बहुत शीघ्र ही भूत का यह विनाश कर दिया करता है ।६६। बीजं चन्द्रगतं वीत स्वरैः षोडशभिः क्रमात् । गलत्परसुधापूर्णे नेत्रे ध्यातं रुजं हरेत् ॥६७ एवमेवस्मृतं बीजं कुक्षौ शूलादिरोगहृत् । स्फोटे विषज्वरे दाहे मोहे शीर्षगदे भ्रमे ॥६८ बीजमेत्तथाध्यातं तत्तत्क्लेशान्विनाशयेत् । कुङ्क माभमिदं वीज त्रिकोणगतमुज्जगलम् ॥६६ यस्य मूर्द्धिन स्मरेन्मन्त्री स वश्यो जायतेऽचिरात । ऊर्ध्वरेफस्थसाध्याख्यं वीजं वहिनगृहे स्थितम् ॥७० वहिनगेहद्वयेनागियुक्तकोणेन संवृतम् । प्रतिलोमस्वरावीतं चुल्लीस्थाने निवेशितम॥७१