शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
४०४ ] [ श्री शारदा तिलक चन्द्रविस्थितं मूर्द्धिन ध्यातं श्वेडगदापहम् । प्रतिलोमस्वरावीतं बीजं वहिनगृहे स्थितम् ॥६५ रेफादिव्यञ्जकोल्लासिषट्कोणाभिवृतं वहिः । भूतार्त्तन्य स्मृतं मूर्द्धिन भूतमाशु विनाशयेत् ॥६६ पूर्वोक्त शैव पीठ पर पूर्व में कथित छे अङ्गों के द्वारा यजन करे । इसके पश्चात् वृषादि मातृकाओं तथा आयुधों के सहित लोकपालों का अर्चन करे ।६२। इसी रीति से परम भगवान अर्द्धनारीश्वर का देवेश्वर का यजन करना चाहिये । ऐसा अर्चन करने वाला साधक तेज कान्ति, यश, लक्ष्मी और वाणी का वल्लभ हो जाया करता है ।६३। प्रासादय मन्त्र का दश हजार जाप रोगों की शान्ति के लिये करना चाहिये । यह वीज स्वरों से आवृत है और इस से परमामृत विगलत होता है ।६४। मूर्धा में चन्द्र विम्व को धारण करने वाले का ध्यान करे तो श्वेत गद का अपहरण करने वाला होता है । प्रतिलोम स्वरों से आवत बीज वहिनगृह मे स्थित है । ६५। रेफादि व्यञ्जनों से शोभित षट्को से बाहर अभिवृत होता है । जो भूतों से आर्त्त होवे उसके मूर्धा में स्मृत किये जाने पर बहुत शीघ्र ही भूत का यह विनाश कर दिया करता है ।६६। बीजं चन्द्रगतं वीत स्वरैः षोडशभिः क्रमात् । गलत्परसुधापूर्णे नेत्रे ध्यातं रुजं हरेत् ॥६७ एवमेवस्मृतं बीजं कुक्षौ शूलादिरोगहृत् । स्फोटे विषज्वरे दाहे मोहे शीर्षगदे भ्रमे ॥६८ बीजमेत्तथाध्यातं तत्तत्क्लेशान्विनाशयेत् । कुङ्क माभमिदं वीज त्रिकोणगतमुज्जगलम् ॥६६ यस्य मूर्द्धिन स्मरेन्मन्त्री स वश्यो जायतेऽचिरात । ऊर्ध्वरेफस्थसाध्याख्यं वीजं वहिनगृहे स्थितम् ॥७० वहिनगेहद्वयेनागियुक्तकोणेन संवृतम् । प्रतिलोमस्वरावीतं चुल्लीस्थाने निवेशितम॥७१
सप्तदश पटल ] [ ४०५ चन्द्रगत बीज क्रम से सोलह स्वरों से वीत होवे तो गलत्पर सुधा से पूर्ण नेत्र में ध्यान किये जाने पर यह नेत्र के रोग का हरण किया करता है ।६७। इस रीति से स्मरण किया हुआ बीज जो कि कुक्षि में किया जावे तो यह शूल आदि रोगों का हरण करने वाला हुआ करता है । स्फोट में, विष ज्वर में, दाह में, मोह में, शीर्ष के रोग में, भ्रम में इस बीज का ठीक उसी भाँति से ध्यान किया जाने पर उन-उन सम्पूर्ण क्लेशों का विनाश कर दिया करता है। यह बीज कुंकुम की समान आभा वाला त्रिकोण में गत उज्ज्वल है ।६८।६६। मन्त्रधारी पुरुष जिसके ही मूर्धा में इसका स्मरण अर्थात् ध्यान करे वही पुरुष थोड़े ही समय में वश्य हो जाया करता है। यहाँ हर ६७ वे श्लोक में जो चन्द्रगत है उसका आशय ठकार गत होता है। ऊर्ध्व रेफ गत साध्य के नाम वाली बीज वह्निगृह में स्थित हैं ।७०। दो वह्निगेह से युक्त अग्नि युक्त कोण से संवृत तथा प्रतिलोम स्वरों से आवृत को चूल्हे के स्थान में निवेशित कर देवे ।७१। वशीकरोति रमणमचिरेणैव दासवत् । मधुरत्रययुक्तेन शालिपिष्टेन पुत्तलीम ।७२ कृत्वा प्रतिष्ठितप्राणां विभज्य जुहुयाद्धशी । त्रिवासरमनेनैव साध्यस्तस्य वशी भवेत् ।७३ मकारगतसाध्याख्यमनलस्थगदाह्वयम् । चन्द्रगञ्चतुरस्रेण तान्तकोणेन वेष्टितम् ।७४ बीजं ताम्बूलपत्रस्थं प्रजप्तं मनुनामुना । भक्षितं नाशयेत्सम्यक् शिरोरोगं न संशयः ।७५ लिखित्वा बन्धुजीवेन त्रिकोणं बीजगर्भितम् । अत्र वह्निं समाधाय सम्यगाराध्य देवताम् ।७६ इसका ऐसा अद्भुत प्रभाव हो ताकि यह रमण को अपने दास की ही भाँति थोड़े समय में वश में कर दिया करता है। तीन मधुरों से युक्त शाली के चून से पुतला बनावे और उसमें पुष्पों की प्रतिष्ठा करे
४०६ ] [ श्री शारदा तिलक और वशी विभाग करके उसमें हवन करे तो इसी के द्वारा तीन दिन में ही साध्य उसके वश गत हो जाया करता है ।७२।७३। मकार गत साध्य के नाम को अनलस्थ गद नाम वाले चन्द्रगत को चतुरस्र (चौकोर) टान्त कोण से वेष्टित करे ।७४। बीज को ताम्बूल के पत्ते में स्थित कर के इस मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित करे। फिर इसका भक्षण करे तो यह शिर के रोग का अच्छी तरह से विनाश कर दिया करता है-इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।७५। बन्धु जीव के द्वारा बीज से गर्भित त्रिकोण लिखकर इसमें वह्नि का समाधान करे और अच्छी रीति से देवता की अराधना करनी चाहिए ।७६। जुहुयात्कृतसंपातं सर्पिषाष्टोत्तरं शतम् । संपाताज्येन संसिक्ता त्रिलोहकृतमुद्रिका ।७७ विधृता भूतवेतालकृत्यारोगविनाशिनी ।७८ ऊर्ध्ववह्निदहितं मनुमेनं वह्निगेहयुगलोपरि लिखितम् । अग्निमस्त्रिषु महीपुरवीतं यन्त्रमेतदुदितं ग्रहगौरि ।७९ अग्निबीजलत्कोणत्रिकोणलिखिते ध्रुवे । शरावे कपिलाज्यान्वज्सूत्रदीपं प्रविन््यसेत् ।८० घटेनैनं पिधायास्य पृष्ठे यन्त्रमिदं लिखेत् । भूतार्तमत्र संस्थाप्य चिन्तामणिमनुं जपेत् ।८१ फिर घृत से अष्टोत्तर शत कृत सम्पात आहुतियां देवे । उस सम्पात किये हुए घृत से संसिक्त करके तीनों लोहों की मुद्रिका बनावे । इस मुद्रिका को धारण करने से यह भूत, वेताल, कृत्या के द्वारा हुए रोगों का विनाश हो जाता है ।७८। अब एक यन्त्र बतलाया जाता है- ऊर्ध्व वह्नि से रहित इस मन्त्र को वह्नि गेह युगल के ऊपर लिखे षट्कोणों में अग्नि को भूपुर से वीत करे । यह मन्त्र ग्रह गौरि नाम वाला कहा गया है ।७९। अग्नि बीज से शोभित कोण त्रिकोण में ध्रुव के लिखने पर मिट्टी के दिये में कपिला गौ के घृत में अब्ज सूत्र वाले
सप्तदश पटल । [ ४०७ दीप का विन्यास करना चाहिए ।८०। इसको घट से ढककर इसके पृष्ठ भाग पर इस मन्त्र को लिखे । जो भूतों से आत्तं होवे उसको यहाँ पर संस्थापित करके चिन्तामणि मन्त्र का जाप करना चाहिए ।८१। तमाविश्य क्षणान्नश्येद्ग्रहः क्रूरोऽपिसर्वथा ।८२ कृशानुभवनद्वये मनुमिमं लिखित्वा पुन— स्तदस्त्रिषु हलोलिखेत्स्वरयुग ततः सन्धिषु । ध्रुवेण परिवेष्ठितं धरणिगेहमध्यस्थितम् । मनोरथफलप्रदं भवति यन्त्रमेतन्नृणाम् ।८३ षट्कोणान्तस्त्रिकोणे लिखतु मनुमिमं साध्यनामाक्षराढ्यम् । षट्कोणेष्वङ्गमन्त्रान्वसुदलविवरेष्वष्टमन्त्राक्षराणि । वीतं बाह्यं कलाभिस्तदनु परिवृत कादिभिर्यादिभिस्त । त्क्षोणीबिम्बेन युक्तं नृहरिमनुयुजा यन्त्रमापद्ग्रहघ्नम् ।८४ अस्मिन्यन्त्रे प्रतिष्ठाप्य कलशं प्रोक्तवर्त्मना । कृताभिषेकः स्यात्कृत्याभूतद्रोहादिशान्तिदः ।८५ उसमें अविष्ट होकर ग्रह चाहे वह सर्वथा क्रूर होवे एक ही क्षण में नष्ट हो जाया करता है ।८२। अग्नि के दोनों गृहों में इस मन्त्र को लिखकर फिर उसके षट्कोण में हलो लिखे । फिर सन्धियों में दो स्वर लिखने चाहिए । ध्रुव से अर्थात् प्रणव से परिवेष्टित करे और धरणी के गेह के मध्य में स्थित करे । यह मन्त्र मानवों के मनोरथों के फल का प्रदान करने वाला होता है ।८३। इस मन्त्र को षट्कोण के अन्दर त्रिकोण में साध्य के नाम के अक्षरों से युक्त लिखे । षट्कोणों में अङ्गभूत मन्त्रों को लिखे और आठ दलों के विवरों में आठ मन्त्रों के अक्षरों का लेखन करना चाहिए । बाहर में कलाओं में वीत करे और इसके अनन्तर आदि और यादि से परिवृत करे तथा क्षोणी विम्ब से युक्त करे । यह नृसिंह मन्त्र से युक्त होवे तो यह यन्त्र आपदा और ग्रहों के नाश करने वाला होता है ।८४। इस मन्त्र में कहे हुए मार्ग
४०० ] [ श्री शारदा तिलक से कलश को प्रतिष्ठापित करे । फिर इससे अभिषेक करे तो कृत्या और भूत द्रोह आदि को शान्ति प्रदाता होता है ।८५। स्वरावृतमयुङ् मनुं लिखतु टान्तमध्ये ततः । षडस्रिषु हुताशनं तदनु कादिवर्णैर्वृतम् । धरापुरयुगेन तन्नृहरिबीजयुक्तास्रिणा । प्रवेष्टितमुदाहृतं दुरितरोगकृत्यापहम् ।८६ क्षकारोमाग्निपवनवामकर्णार्द्धचन्द्रवान् । उक्तं तुम्बुरुबीज तद्येन सिध्यन्ति साधकाः ।८७ षड्दीर्घभाजा बीजेन ऽङ्गानिप्रकल्पयेत् । क्षकाररहितं बीजं क्रमाज्जभसहान्वितम् ।८८ चत्वारि देवीबीजानि देव्यो ज्ञेया इमाः क्रमात् । जयाख्या विजया पश्चादजितर चापराजिता ।८९ बीजमंगुलिषु न्यस्य करयोर्व्यापकंततः । कनिष्ठादिषु विन्यस्येत्षडङ्गानि तलावधि ।६० फिर टान्त के मध्य में स्वरों से आवृत अयुक् मन्त्र को लिखे । षट्कोण में हुताशन को लिखे फिर इसके अनन्तर कादिद वर्णों से इसको वृत करे । फिर दो भूपुरों से तथा नृसिंह के बीज से युक्त षट्कोण से इसको परिवेष्टित करे। यह दुरित रोग और कृत्या के दोषों का अप- हरण करने वाला उदामृत किया गया है ।८६। क्षकार, अग्नि, पवन, वाम, कर्ण अर्ध चन्द्र वाला—यह तुम्बुरु बीज कहा गया है जिसके द्वारा साधकगण सिद्ध होते हैं ।८७। छै दीर्घों से युक्त बीज के द्वारा छै अङ्गों की कल्पना करनी चाहिए । क्षकार से रहित बीज से क्रम से ज—भ—स—ह से अन्वित होता है ।८८। चार देवी के बीज होते हैं । उनको क्रम से जान लेने चाहिए । जया—विजया—अजिता—अपरा- जिता है । बीज का अँगुलियों में न्यास करके पीछे दोनों करों में व्यापक न्यास करना चाहिए । फिर कनिष्ठा आदि में तल की अवधि पर्यन्त षडङ्गों का न्यास करे ।८६।६०।
सप्तदश पटल ] [ ४०६ देवं देवीः स्वबीजादि कनिष्ठादिषु विन्यसेत् । पादान्मूर्द्धाविधि न्यस्येन मुष्टिनावयवेषु तत् ।६१ तलाभ्यां व्यापकं कुर्यान्मूर्धादि चरणावधि । षडङ्गानि ततोन्यस्येद्यस्थानं विशालधीः ।६२ देवं देवी यथापूर्वं मूर्द्धास्यहृदयाम्बुजे । नाभौ गुह्ये क्रमान्न्यस्येतपश्चाद्देव विचिन्तयेत् ।६३ रक्ताभमिन्दुसकलाभरणं त्रिनेत्रं खट्वाङ्गपाशसृणिशूलकपालहस्तम् वेदाननं चिपिटनासमनर्घ्यभूषं रक्ताङ्गरागकुसुमांशुकमीशमीडे ।६४ लक्षमानं जपेन्मन्त्रं जुहुयात्सर्पिषाऽयतम् । वक्ष्यमाणे यजेत्पीठे देवमावरणैः सह ।६५ देव का–देवी का और स्वबीजादि का कनिष्ठ का आदि में न्यास करे । पाद से मूर्धा की अवधि तक मुष्टि से अवयवी में उनका न्यास करे ।६१। मूर्धा से आदि लेकर चरणों की अवधि पर्यन्त तलों से व्यापक न्यास करना चाहिए । विशाल बुद्धि वाले पुरुष को चाहिए कि वह इसके अनन्तर स्थान के अनुसार षट् अङ्गों का न्यास करे ।६२। देव का और देवी पूर्व की ही तरह से मूर्धा, मुख, हृदय कमल, नाभि; गुह्य क्रम से न्यास करना चाहिए । इसके पश्चात् इस प्रकार से चिन्तन करे ।६३। अब ध्यान बतलाया जाता है—रक्त आभा से युक्त, चन्द्रखंड के आभरण से भूषित—तीन नेत्रों वाले—करों में खट्वाङ्ग—पाश—सृणि— शूल और कपाल को धारण करने वाले—चार मुखों से समन्वित— चिपिटनासिका से युत—श्रेष्ठ वेषभूषा से भूषित—रक्त अङ्गराज से युत—कुसुमों के वस्त्रधारी ईश का स्तवन करता हूँ ।६४। एक लाख मान में इस मन्त्र का जप करे और जप का दशांश भाग दश सहस्र घृत से होम करे । आगे कहे जाने वाले पीठ पर आवरणों के साथ देव का यजन करे ।६५। नपुंसकस्वरैर्विद्वान्स्वराद्यन्तद्वयेन च । धर्मादिकानधर्माद्यान्पादगात्राणि विन्यसेत् ।६६
४१० ] [ श्री शारदा तिलक इकारेण न्यसेत्पश्चात्तत्त्वरूपान्गुणानथ । शान्त्या तत्परवर्णेन मायाविद्यामजे क्रमात् ।६७ अधऊर्ध्वच्छन्दे न्यस्येदधीशेन ततोऽम्बुजम् । सन्ध्यक्षरैर्यजेन्मन्त्रों शक्तीर्वामादिकाः क्रमात् ।६८ वामां ज्येष्ठां तथा रौद्रीमिच्छां ज्वालास्वरूपिणीः । एवं प्रकल्पित पीठे मूर्ति मूलेन कल्पयेत् ।६६ आवाह्य पूजयेद्देवं तस्यामावरणैः सह । अङ्गावृत्तेर्बहिर्देवीं दिक्पत्रेषु समर्च्चयेत् ।१०० विद्वानों को उचित है कि नपुंसक स्वरों से और स्वराद्यन्त दो से धर्मादि काम धर्मियों तथा पादगात्रों का विन्यास करे ।६६। ईकार से न्यास करे और पीछे तत्व रूप गुणों को, शान्ति से तत्पर वर्ण के द्वारा क्रम से माया विद्यमय में नीचे ऊपर के छन्द में न्यास करे । अर्धीश से अम्बुज को करे । मन्त्रधारी शक्तियों और वामदिक का क्रम से यजन करे ।६७।६८। उन शक्तियों नामों का परिगणन करके बताया जाता है—वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, इच्छा, ज्वाला स्वरूपिणी हैं । इस प्रकार से प्रकल्पित पीठ पर मूल मन्त्र के द्वारा मूर्त्ति की कल्पना करनी चाहिए ।६६। उस मूर्त्ति में देव का आवाहन करके आवरणों के सहित पूजन करे । अङ्गावृत्ति के बाहर दिक् पत्रों में देवी का अर्चन करना चाहिए ।१००। जयाद्याः स्वस्वबीजेन रक्ता रक्तानुलेपनाः । अरुणांशुकपुष्पाढ्यस्ताम्बूलाऽऽपूरिताननाः ।१०१ बल्लकीवादनपरा मदमन्मथपीडिताः । ईशादिकोणेष्वभ्यचेद्दूतीबीजादिकाः क्रमात् ।१०२ दुर्भगां सुभगां भूयः करालीं मोहिनीमिमाः । बद्धाञ्जलिपुटाः किचिदानम्रवदनाम्बुजाः ।१०३ देवीः सदृशभूषाडया दूतीमन्त्राविदुः क्रमात् । चतुरः शादिकान्वर्णानिद्धेन्दुकृतशेरान् ।१०४
सप्तदश पटल ] [ ४११ लोकपालान्यजेद्वाह्ये वज्राद्यायुधसंयुतान् । एव यो भजते भक्त्या देवमुक्तेन वर्त्मना ।१०५ जपाद्या स्वस्थ बीज से रक्ता है और रक्त अनुलेपन वाली है। अरुण वर्ण के वस्त्र और पुष्प से आढ्य है। उनका मुख ताम्बूल से परि- पूरित रहता है। ये सब वल्लकी वाद्य के वादन करने में परायण हैं और मद तथा मन्मथ (कामदेव) से पीड़ित हैं ईशादि कोणों में बीजा- दिक दूतियों का क्रम से अभ्यर्चन करे ।१०१।१०२। दूतियों के नामों का परिगणन किया जाता है—दुर्भगा, सुभगा, कराली, मोहिनी—ये हैं। ये सब अपनी अंजलिपुटों को बाँधे हुए हैं और इनका मुख कमल नम्रता से कुछ नीचे की ओर हो रहा है ।१०३। ये सब देवी के ही समान भूषणों से समन्वित हैं। अब दूतियों के मन्त्रों को क्रम से जान लेवे। चार शाकादि वर्ण अर्थात् शषसह, अर्धेन्दु—बिन्दु से शेखरों वाली हैं ।१०४। बाहर लोकपालों का यजन करे तथा वज्र आदि उनके आयुधों का अर्चन करे। इस प्रकार से उक्त मार्ग के द्वारा जो भक्ति की भावना से देव का अर्चन किया करता है ।१०५। न तस्य दुर्लभं किञ्चित्त्रिषु लोकेषु विद्यते । वायुवह्निपरान्तस्थं बीजं स्मृत्वा जपेत्सुधीः ।१०६ ज्वरभूतमहारोगानश्यन्ति तेन तत्क्षणात् । क्रुद्धस्य हृदये ध्यात्वां जपेद्वीजमनन्यधीः ।१०७ स वश्यो जायते शीघ्रं मन्त्रस्यास्य प्रभावतः । हृद्रोगे कामला रोगे विष्टम्भि श्वासकासयोः ।१०८ एतज्जप्तं जलं प्रातः पिबेत्तद्रोगशान्तये । कृत्वा नवपदात्मानं मण्डलं तत्र शोभनम् ।१०६ कलशांस्थापयेन्मन्त्री नव पूर्वोक्तलक्षणान् । मध्यदेवं यजेत्सम्यक् देवीः पूर्वांदिकुम्भगाः ।११० इष्ट्वा कोणस्थिता दूतीरभिषिञ्चेत्पतिव्रता । नारी सा लभते पुत्रं वन्ध्यापि किमुतापरा ।१११
४१२ ] [ श्री शारदा तिलक भूतकृत्याग्रहद्रोहशान्तिदः संपदावहः । अभिषेकोऽयमाख्यातो राज्ञां विजयवर्द्धनः ११२ उस पुरुष को तीनों लोकों में कुछ भी वस्तु अप्राप्य नहीं है। वायु वह्निपुर के अन्दर स्थित बीज को स्मरण करके अनन्य बुद्धि वाला होकर जप करे तो उसके ज्वर भूत महा रोग उसी क्षण में नष्ट हो जाया करते हैं। क्रुद्ध का हृदय में ध्यान करके अनन्य बुद्धि होकर बीज का जप करे ।१०६।१०७। इस मन्त्र के प्रभाव से वह शीघ्र ही वश्य हो जाता है। हृद्रोग में-कामला रोग में विष्टम्भ श्वास और कास में-इस मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित जल को प्रातःकाल में रोग की शान्ति के लिए पान करना चाहिए। नव पदों के स्वरूप वाले मंडल की रचना करके उसमें परम शोभन पूर्व में वर्णित नौ कलशों की मन्त्रधारी स्थापना करे। मध्य में देव का यजन करे और पूर्वादि कुम्भों में स्थित देवियों का अर्चन करे ।१०८।१०६।११०। कोणों में स्थित दूतियों का अर्चन करके पतिव्रता स्त्री अभिषिञ्चन करे ! वह नारी अवश्य ही पुत्र जन्म का लाभ किया करती है, चाहे वह वन्ध्या ही क्यों न हों औरों की तो बात ही क्या है ।१११। यह अभिषेक भूत-कृत्या द्रोह को शांति देने वाला होता है तथा सम्पदाओं का आवाहन किया करता है और राजाओं की विजय का वर्धन करने वाला है ।११२। अन्तर्बीजं स्वरगणलसत्केसरं तस्य बाह्ये । देवीदूतीमनुयुतदलं दिग्विधिक्षु क्रमेण ॥ काद्यैर्वर्णैर्वृतमथ वह्निभूमिगेहेन वीतम् । यन्त्रं प्रोक्तं सकलसुखदं रोगकृत्याग्रहघ्नम् ।११३ प्रणवो हृदयं पश्चात्तु ङेऽन्तं पशुपति पुनः । तारो नमोभूतपदं ततोऽधिपतये ध्रुवम् ।११४ नमो रुद्राय युगलं खड्गरावणशब्दतः । विरहद्वितयं पश्चात्सरनृत्ययुगं पृथक् ।११५
सप्तदश पटल ] [ ४१३ श्मशानभस्मार्चितान्ते शरीराय ततः परम्। घण्टाकपालमालावि धरायति पदं पुनः ।११६ व्याघ्रचर्मपदस्यान्ते परिधानाय तत्परम् । शशाङ्ककृतशब्दान्ते शेखराय ततः परम् ।११७ कृष्णसर्पपद पश्चात्ततो यज्ञोपवीतिने । चलयुग्मं वल्गुगमनिवर्तकपालिने ।११८ हनयुग्मं ततो भूतान त्रासयद्वितयं पुनः । भूयो मण्डलमध्ये स्यात् कट्टयुग्मं ततः परम् ।११९ रुद्राङ्कुशेन शमय प्रवेशययुगं तत । आवेशययुगं पश्चाच्चण्डासिपदमीरयेत् ।१२० धराधिपतिरुद्रोऽथ ज्ञापयत्यग्निसुन्दरी । खडगरावणमन्त्रोऽयं सप्तत्यूर्ध्वशताक्षरः ।१२१ अब मन्त्र बतलाया जाता है—आठ दलों से समन्वित कमल की रचना करके उसकी कर्णिका में मूल का लेखन करके दिशाओं के दलों में देवी के बीजों को तथा विदिशाओं में दूतों बीजों को लिखना चाहिए। क्रम से ही अर्थात् पूर्व की ही रीति से लिखे। ककार से आदि वर्णों के द्वारा उसे बीत करे तथा बाहर में भूपुर की रचना करके उससे परि- वीत करे। यह मन्त्र ऐसा ही बताया गया है जो समस्त सुखों का प्रदान करने वाला है और रोगों का तथा कृत्या के गृहों का विनाश करने वाला है ।११३। अब खङ्ग रावण मन्त्र बतलाया जाता है-प्रणव हृदय और इसके पीछे चतुर्थी विभक्ति जिसके अन्त में होवे ऐसा पशु- पति'-पद लिखे। फिर तार—प्रणव, फिर भूत अधिपति और ध्रुव अर्थात् प्रणव लिखे। इसके पीछे 'नमो रुद्राय' इसका युगल लिखे। खग रावण शब्द से 'विरहा' का युगल लिखें। फिर 'नृत्य' पद का युगल लिखे। इसके अनन्तर 'श्मशान भस्मार्चित शरीराय' - और 'घंटा कपाल माला धराय'-यह पद कहे। इसके पश्चात् 'व्याघ्र चर्म परिधानाय' और 'शशांक कृत शेखराय'-यह लिखे। इसके अनन्तर 'कृष्ण सर्प यज्ञोपवीतिने
४१४ ] [ श्री शारदा तिलक यह पद लिखे । इसके आगे 'चल-चल' और 'अनिवर्त्त कपालिने'-हन- हन-भूतान् त्रासय-यह लिखे । फिर मण्डप के मध्य में- 'फट्-फट्' और रुद्राङ्कुशेन 'शमय-प्रवेशाय' का युग्म लिखे । फिर 'खण्डासि' पद कहे । धराधिपति रुद्रो ज्ञापय-यह लिखकर 'स्वाहा लिखना चाहिए । यह खङ्ग रावण मन्त्र है जो एक सौ सत्तर अक्षरों वाला है । भूताधिपतये स्वाहा पूजामन्त्रोऽयमीरतः । सद्यादिपञ्चह्रस्वाड्यकान्तबीजादिकान्न्यसेत् ।१२२ ईशानाद्याः पञ्चमूर्तीर्देहे वक्त्रेषु च क्रमात् । षड्दीर्घविन्दुयुक्तेन मन्त्रे नाङ्गक्रिया मता ।१२३ घण्टाकपालसृणिमुण्डकृपाणखेटखट्वाङ्गशूलडमरूनभयन्दधानम् । रक्ताङ्गमिन्दुशकलाभरणं त्रिनेत्र पञ्चाननाब्जमरुणांशुकमीशमीडे । ॥१२४ अयुतद्वितयं मन्त्रं जपित्वा तद्दशांशतः । पायसेन घृता यक्तेन जुहुत्तस्यसिद्धये ।१२५ पञ्चाक्षरोदिते पीठे पूजयेत्खङ्गरावणम् । बीजेन मूर्तिक्लृप्तिः स्यात्तत्कान्तं मनुविन्दुमतू ।१२६ भूताधिपतये स्वाहा-यह पूजा मन्त्र कहा गया है। सद्य जिनके आदि में होवे ऐसे पंचह्रस्व से आढ्य कान्त बीजादिक का न्यास करे । ।१२२। ईशानाद्य पांच मूर्त्तियों का देह में और वक्त्रों में क्रम से षड्- दीर्घ विन्दु से युक्त मन्त्र से इसकी अङ्गों की क्रिया मानी गई ।१२३। अब ध्यान का प्रकार बतलाया जाता है-घण्टा, कपाल, सृणि-मुण्ड कृपाल, खेट, खट्वाङ्ग, शूल, डमरू और अभयदान को धारण करने वाले-रक्ताङ्ग और चन्द्रमा के खण्ड के आभरणों से अलंकृत-तीन नेत्रों से संयुत-पांच मुख कमलों से समन्वित-अरुण वर्ग के वस्त्रों को धारण करने वाले ईश का मैं स्तवन करता हूँ ।१२४। इस मन्त्र का दो अयुत अर्थात बीस सहस्र जप करे और फिर जप का दशांश भाग का
सप्तदश पटल ] [ ४१५ उसकी सिद्धि के लिए घृत से अक्त पायस से होम करना चाहिए । १२५। पंचाक्षर के उदित पीठ पर खङ्ग रावण का अर्चन करे । बीज के द्वारा मूर्त्ति की कल्पना करनी चाहिए । उसका कान्त मन्त्र से युक्त है । । १२६। अङ्गानि दलमूलेषु दूतीः पत्रेषु संयजेत् । चुलुकुण्डां प्रज्वलिनीं तृतीयां कृष्णपिङ्गलाम् । १२७ फल्गुनीं टिरिटिल्लीं च पञ्चमी मन्त्रमालिकाम् । सप्तमीं शंखिनीं पश्चाच्चन्द्राङ्कितजटामिमाः । १२८ पूर्वपत्रादि सव्येन खडगरावणवल्लभाः । ऐन्द्री कौमारिकी ब्राह्मी वाराहीं वैष्णवीं पुनः । १२६ वैनायकीं च चामुण्डां माहेशीं दिक्षु पूजयेत् । द्वारपालान्यजेद्दिक्षु द्वौ द्वौ प्रागादिदेशिकः । १३० अङ्गों का दलों के मूलों में और दूतियों का पत्रों में भली भाँति यजन करना चाहिए । अब उनके नामों का परिगणन करके बताया जाता है, चुलुकुण्डा, प्रज्वलिनी और तीसरी कृष्ण पिङ्गला है । १२७। फल्गुनी, टिरिटिल्ली पाँचवी और छठी मन्त्रमालिका है । सप्तमी शंखिनी—और चन्द्रांकित जटा है । ये पूर्व पत्रादि सव्य में खड्ग रावण की वल्लभायें हैं । इनके पश्चात् ऐन्द्री, कौमारिका, ब्राह्मी, वाराही, वैष्णवी, वैनायिकी, चामुण्डा और माहेशी का दिशाओं में अर्चन करना चाहिए । फिर आचार्य द्वारा पूर्व आदि दिशाओं में दो-दो द्वारपालों का यजन करना चाहिए । १२८-१३०। रौद्रपिङ्गलनामानौ द्वौ श्मशानविभीषणौ । दृढकर्ण भृङ्गिरीटिमुदीच्यामर्चयेत्पुनः । १३१ आमईकमहाकालौ कोणपालान्यजेत्पुनः । कुम्भकर्णमशोकाख्यं भल्लाटं च सिहारकम् । १३२ इन्द्रादिकाँल्लोकपालान्सायुधान्पूजयेत्ततः । धूपदीपादिभिर्देवं प्रीणयित्वा महेश्वरम् । १३३
४१६ ] [ श्री शारदा तिलक पञ्चकूरान्धसा वाह्यै ततो भूतबलि हरेत् । एवं पूजादिभिः सिद्धै मन्त्रै मन्त्रविदाम्बरः ।१३४ नाशयेत्सकलान्भूतान्कृत्याग्रहमहाभयान् । आदेश तस्य कुर्वन्ति भूता भीता महात्मनः ।१३५ बहुना किमिहोक्तेन मन्त्रेणानेन भूतले । सदृशोनास्ति मन्त्रोऽन्योभूतनिग्रहसाधने ।१३६ रौद्र पिंगल नामों वाले दो और श्मशान विभीषण वाले दो दृढ़- कर्ण और भृंगि-रीटिका उत्तर में पुनः समर्चन करना चाहिये ।१३१। फिर इसके अनन्तर आमर्दक-महाकाल और फिर कोण पालों का यजन करे । कुम्भकर्ण—अशोक नामक भल्लाटक और सिहरक का अर्चन करना चाहिए ।१३२। इसके अनन्तर इन्द्रदेव आदि लोक पालों का जो अपने २ आयुधों के सहित होवें पूजन करे । धूप-दीप आदि पूजन के उपचारों के द्वारा देवेश्वर महेश्वर प्रभु का प्रीणन करना चाहिए ।१३३ बाहिर में पञ्च कूरान्ध से भूत बलि का पीछे आहरण करे । इस रीति से पूजादि के द्वारा मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर मन्त्रों के ज्ञान रखने वालों में परम श्रेष्ठ पुरुष समस्त भूतों का तथा कृत्या के ग्रहों का और महान् पापों का विनाश कर दिया करता है । उस महान् आत्मा वाले पुरुष से फिर भीत होकर भूतगण आज्ञा का पालन करते हैं ।१३४- १३५। इस मन्त्र के विषय में यहाँ पर बहुत अधिक कहने का क्या प्रयोजन है बस इतना ही कहना पर्याप्त है कि इस भू-मण्डल में इस मन्त्र की समानता रखने वाला भूतों के विग्रह करने के साधन में अन्य कोई दूसरा मन्त्र ही विद्यमान नहीं है ।१३६।
अष्टादश पटल ] [ ४१७ अष्टादश पटल ॥ अघोरास्त्रो वर्णन ॥ अथाभिधास्ते विधिवदघोरारास्रमनुत्तमम् । यस्य संस्मरणादेव सर्वे नश्यन्त्युपद्रवाः ।१ माया स्फुरद्वय भूयः प्रस्फुरद्वितयंततः । घोरघोररतरेत्यन्ते तनुरूपपदं पुनः ।२ चटयुग्मं तदन्तेस्यात्प्रचटद्वितयं ततः । कहयुग्मं वमद्वन्द्वं ततो बन्धयुगं पुनः ।३ घातयद्वितयं वर्म फडन्तः समुदाहृतः । एकपञ्चाशदक्षोऽयमघोरास्त्रमहामनुः ।४ अघोरारोऽस्य मुनिः प्रोक्तश्छन्दस्त्रिष्टुबुदाहृतम् । अघोररुद्रः संदिष्टो देवता मन्त्रवित्तमैः ।५ इसके अनन्तर परमोत्तम अघोरास्त्र के विषय में वर्णन करूँगा ' जिसके संस्मरण मात्र से ही सब उपद्रव नष्ट हो जाया करते हैं।१। मन्त्र का उद्धार करके बताया जाता है—माया शक्ति बीज, दो बार 'स्फुट'—यह पद, इसके पश्चात् 'प्रस्फुट'—यह पद दो बार कहे, घोर घोरतर'—इस पद के पश्चात् 'तनुरूप'—यह पद कहे ।२। इसके अन- न्तर दो बार 'चट'—इस पद को बोले और इसके अनन्तर दो बार 'प्रचड'—इस पद का उच्चारण करना चाहिए । इसके उपरान्त दो बार 'कह'—यह पद और 'वम'—यह दो बार कहे। फिर 'बन्ध' को दो बार कहे और 'घातय' इसको दो बार कहे । फिर वर्म और फट् कहे । यह मन्त्र बताया गया है। यह अघोरास्त्र मन्त्र इक्यावन वर्णों का होतो है, जो यहाँ पर बताया गया है ।३-४। इस मन्त्र का ऋषि अघोर होता है और इसका छन्द अनुष्टुप गया है। मन्त्रों के शनि
४१८ ] [ श्रीशारदा तिलक रखने वाले पुरुषों के द्वारा इस मन्त्र का देवता अघोर रुद्र ही बताये गये हैं ।५। हृदय पञ्चभिः प्रोक्तं शिरः षड्भिरुदाहृतम् । शिखा दशभिराख्याता तावद्भि कवच मतम् ।६ वसुवर्णैः स्मृतं नेत्रं मासार्णैरस्त्रमीरितम् । मूर्द्धनेत्रास्य कण्ठेषु हृन्नाभ्यन्धूरुषु क्रमात् ।७ जानुजंघापदद्वन्दे रुद्राभिन्नाक्षरैर्न्यसेत् । पञ्चभिश्चपुनः षड्भिर्द्वाभ्यामष्टभिरक्षरैः ।८ चतुर्वर्णैः षडूर्णे श्च करणेः करणे पुनः । चतुर्भिः षड्भिरक्षिभ्यां वर्णभेदोऽयमीरितः ।६ सजलघनसभाभं भीमदंष्ट्रं त्रिनेत्रं भुजगधरमघोरं रक्तवस्त्रङ्गरागम् । परशुडमरुखड्गान्खेटक वाणचापौ त्रिशिखनरकपाले विभ्रतं भावयामि ।१० इसका हृदय पाँचों से बताया गया है और छै से इसका शिर कहा गया है । इसकी शिखा दश से बतायी गयी है और उतनी ही से इसका कवच माना गया है ।६। आठ वर्णों से इसका नेत्र कहा है और बाहर वर्णों के द्वारा इसका अस्त्र बताया गया है इसका न्यास क्रम से मूर्धा नेत्र-मुख-कण्ट-हृदय-नाभि--अन्धु-उरुओंमें-जानु-जंघा और दोनों चरणोंमें रुद्र से भिन्न अक्षरों के द्वारा करना चाहिए । फिर पाँचों से, छै से, दो से, आठ अक्षरों से, चार वर्णों से, छै वर्णों से और फिर चार करणों और छै अक्षियों करे । यह वर्ण भेद कहा गया है ।७।८।६। अब ध्यान करने की रीति बतलायी जाती है—ध्यान—जल के सहित मेघों की आभा के समान आभा से समन्वित—महान् भीषण दाढ़ों से युक्त—तीन नेत्रों वाले—सूर्योको अपने शरीर पर धारण करने वाले— रक्त वस्त्र के तुल्य अङ्गराग से संयुत—अपने कर कमलों में परशु—
अष्टादश पटल ] [ ४१६ डमरू—खङ्ग—खेटक—वाणचाप—त्रिशिख—नर, कपाल को धारण करने वाले अघोर की भावना करता हूँ ॥१०॥ अभिचारे ग्रहध्वंसे कृष्णवर्णो भवेद्विभूः । वश्ये कुसुमभसङ्काशो मुक्तौ चन्द्रमप्रभः ॥११ लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं घृत सक्तोस्तलंः शुभैः । तद्दशांशं प्रजुहुयान्मन्त्री मन्त्रस्य सिद्धये ॥१२ शैवे सम्पूजयेत्पीठे षट्कोणान्तः स्थपङ्कजे । अ गपूजां केसरेषु कृत्वा पत्रेषु तत्परम् ॥१३ परशुं डमरुं खड्गं खेट बाण च (णांश्च) कार्मुकम् । शूलं कपालां प्रयजदष्टास्त्राण्यस्य देशिकः ॥१४ दलाग्रेषु ततः पूज्या ब्राह्मयाद्याः प्रोक्तलक्षणा । लोकेशान्पूजयेत्पश्चादायुधैः स्वैः समन्वितान् ॥१५ अभिचार में-ग्रहों के ध्वंस में विभु का कृष्ण वर्ण होता है । वश्य के प्रयोग में विभु का वर्ण कुसुम्भ के सदृश हुआ करता है और मुक्ति में उसका वर्ण चन्द्र के समान प्रभा से संयुत होता है ॥११॥ इस मन्त्र का एक लाख जाप करना चाहिए और घृत सिद्ध परम शुभों तिलों से जप का दशांश भाग का होम करे ।। तभी मन्त्रधारी को मन्त्रकी सिद्धि होती है ॥१२। शैव पीठ पर षट्कोण के अन्दर स्थित कमल अच्छी तरह से यजन करना चाहिए । अङ्गों की पूजा केसरों में करके फिर पत्रों आयुधों का अर्चन करे जिनके नाम ये हैं—परशु, डमरू, खड्ग, खेट, बाण, कार्मुक, शूल, कपाल ॥१३॥१४। दलों के अग्रभागों में इसके अनन्तर ब्राह्म्यादि का यजन करना चाहिये जिनके लक्षण पूर्व में ही कह दिये गये हैं । इनके पश्चात् लोकपालों का अर्चन करे जो कि वज्रादि अपने-अपने आयुधों के सहित है ॥१५। इति पूजाविधिः सिद्धे मन्त्रेणानेन साधकः । इष्टान्नप्रयोगान्कुर्वीत सिद्ध्यन्ते नात्र संशयः ॥१६
४२० ] [ श्रीशारदा तिलक क्रमात्सर्पिर्पामार्गतिलसर्षपपायसैः । साज्यैः सहस्रं प्रत्येकं यामिन्यां जुहुयात्सुधीः ।१७ होमोऽयं नाशयेत्सद्यो भूतकृत्याद्युपद्रवान् । सितकिंशुकनिर्गुण्डी होमाऽपामार्गसम्भवैः ।१८ समिद्वरैः कृतोहोमः पूर्ववद्भूतशान्तिदः । चपामार्गारग्वधयोः पञ्चगव्यसमुक्षिताः ।१६ समिधो जुहुयात्कृष्णपञ्चम्यां निशि संयतः । पृथक् सहस्रहोमेन भूतानां निग्रहो भवेत् ।२० इस प्रकार से अर्चना आदि के द्वारा मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर साधक इस मन्त्र के द्वारा अपने अभीष्ट प्रयोगों का समाचरण करे । वे सभी प्रयोग सिद्ध होते हैं-इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।१६। फिर क्रम से घृत- अपामार्ग-तिल- सरसों और पायस से प्रत्येक की घृत के साथ सहस्र आहुतियाँ देवे और सुधी पुरुष रात्रि में होम करे । यह किया हुआ होम तुरन्त ही भूतों और कृत्या आदि के उपद्रवों का विनाश कर दिया करता है । सफेद पलाश (ढाक) निर्गुण्डी के द्वारा किया हुआ होम तथा अपामार्ग से समुद्भूत श्रेष्ठ समिधाओं से किया गया होम पूर्व की ही तरह भूतों को शान्ति का देने वाला होता है । ।१७-१८। अपामार्ग और आरग्वध की समिधाएं जो पञ्चगव्यमें संभु- क्षित की गयी होवे ।१९। मास की कृष्ण पक्ष की पंचमी में रात्रि के समय में संयत होकर हवन करे । पृथक् एक सहस्र होम से भूतों का निग्रह होता है ।२०। क्रमात्सर्पिरपामार्गं पञ्चगव्य दृविघूतैः । हुत्वा सहस्रं प्रत्येकं पात्रे संपा (१) नयेत्सुधीः ।२१ संपातसर्पिषा साध्यं भोजयेद्भूतशान्तये ।२२ मध्ये शक्तिं ससाध्यां स्वपगणसहितां केसरेष्वष्टवर्गा- न्पत्रान्तर्म्मन्त्रवर्णान् लिखिय गुणमितानग्रदेनेषु तद्वत् ।
अष्टादश पटल ] [ ४२१ वर्म्मास्त्रोल्लासिकोणे दहनपुरयुगे कल्पिते भूपुरस्थे यन्त्रेऽस्मिन्प्राग्विधानात्कृतकलशविधिः सर्वदुःखापहारी ।२३ षट्कोणे शक्तिरन्तः स्फुरयुगलवृत्ता प्रस्फुरद्वन्द्वकोणे शिष्टैर्मन्त्रस्य वर्णै रसकरणचतुः षट् चतुर्वेदवेदैः । षडङ्गैः कॢप्ताष्टपत्रं दहनपुरयुगेनावृतं वर्म स्फुटः राजत्कोणेन वीतं (वाह्यं) धरणिपुरयुगं यन्त्रमाघोरमेतत् ।२४ क्षुद्रचोरग्रहव्यालभूतापस्मारनाशनम् । यन्त्रमेतत्समाख्यातं सर्वसिद्धिप्रदातृकम् ।२५ क्रमसे घृतःअपामार्ग, पंचगव्य-हवि और घृतसे प्रत्येककी एक सहस्र आहुतियां देवे और सुधी एक पात्रसे घृतका सम्पात करे।२१।उस सम्पात के घृतसे साध्य व्यक्ति को भूतोंकी शान्तिके लिये भोजन करावे।२२।अब एक मन्त्र बतलाया जाता है । इसका उद्धार इस तरहसे होता है-मध्यमें साध्य के सहित शक्ति को जो स्वरगणसे सहित होवे लिखे और केसरों में अष्ट वर्णों का लेखन करे तथा पत्रों के अन्दर मन्त्र के वर्णों को लिखे। उसी भाँति अग्रदेशों में गुणमितों को लिखे । वर्म और अस्त्र से शोभित कोण में लिखे । भूपुर में स्थित दहनयुगों के युग में जो कि कल्पित किया गया होवे । इस मन्त्र में पूर्वोक्त विधान से कलश की विधि को करे तो यह मन्त्र सब दुःखों का अपहरण करने वाला होता है ।२३। अब अन्य मन्त्र को बतलाया जाता है-षट्कोण में शक्ति है और अन्दर स्फुरित युगल से वृत हो । फिर प्रस्फुर द्वन्द कोणमें आवृता होव । मंत्र के शिष्ट वर्णों से छै-करण-चार-सौ चार वेद वेदोंसे षडङ्ग क्लृप्त अष्टपत्र को जो दहन पुरयुग से आवृत्त वर्म हो स्फुट से शोभित कोणसे परिवीत करे और इसमें दो भूपुर होते है-यही अघोर मन्त्र होता है ।२४। यह मन्त्र क्षुद्र चोर ग्रह-व्याल भूत-अपस्मार का नाश करने वाला है और यह सब सिद्धियों का प्रदान करने वाला कहा गया है ।२५। तारोवान्तोधरासंस्थो वामनेत्रेन्दुभूषितः । पार्श्वोवकः कर्णयुतो वर्म्माश्वान्तः षडक्षरः ।२६
४२२ ] [ श्रीशारदा तिलक मनुः पाशुपतास्त्राख्यो ग्रहक्षुद्रनिवारणः । षडभिर्वणैः षडङ्गानि हुंकडन्तैः सजातिभिः ।२७ मध्याह्नाकंसमप्रभं शशिधरं भीमाट्टहासोज्ज्वलम् । त्र्यक्षं पन्नगभूषणं शिखिशिखाश्मश्रुस्फुरन्मूर्द्धजम् । हस्ताब्जैस्त्रिशिखं समुद्गरमसिं शक्ति दधानं विभुम् । दंष्ट्रोमिच्चतु' मुख' पशुपति दिव्यास्त्ररूप स्मरेत् ।२८ वर्णलक्षं जपेन्मत्रं जुहुयात्तद्दशांशतः । गव्येन सर्पिषा मन्त्री संस्कृते हव्यवाहने ।२६ शैवे पीठे यजेद्देवं प्राङ्गैरष्टमातृभिः । इन्द्र दिभिर्लोकपालै र्थज्राद्यै रायधैस्ततः ३० अब पाशुपतास्त्र को बताते हैं तार-प्रणव व्यक्त-शकार, धरा-ल, उसमें स्थित वामनेत्र-ई, इन्दु-अनुस्वार त भूषित है। पार्श्व पः, वकः-- श, कर्णयुत-उकार से संयुत, वर्मास्त्रान्तः षट् अक्षरों वाला है ।२६। यह पाशुपत नामक मन्त्र ग्रहों और क्षुद्रों के निवारण करने वाला होता है । जिसके अन्त में हुँ फट् हो ऐसे सजाति छै वर्णों से छ अङ्गों को करना चाहिए ।२७। अब ध्यान बताया जाता है मध्याह्न काल के सूर्य के समान प्रभा से समन्वित-चन्द्रदेव को धारण करने वाले-परम भीषण अट्टाहास से समुज्ज्वल-तीन नेत्रों से युक्त- सर्पों के भूषणों से संयुत की शिखा के समान श्मश्रु तथा स्फुरित केशों से युक्त हस्त कमलों के द्वारा त्रिशिख सुन्दर-असि और शक्ति का धारण करने वाले विभु का जो दाढों के द्वारा परम भीषण चार मुखों वाले-दिव्य अस्त्र स्वरूप पशुपति प्रभु का स्मरण करना चाहिये ।२८। इस मन्त्र में जितने वर्ण होवे उतने ही लाख इस मन्त्र का जप करना चाहिये । और जप के दशांश भाग का गाय के घृत से होम करे और मन्त्रधारी पुरुष को संस्कार किये हुये अग्नि में ही हवन करना चाहिये ।२६। शैव पीठ पर देव का यजन करे जो प्राक् अङ्ग, अष्ट मातृका-इत्यादि देवगण, लोकपाल और उनके वज्रादि आयुधों के
अष्टादश पटल ] [ ४२३ साथ ही यजन करे, तात्पर्य यह है कि सबका पूजन करना चाहिये।३०। अनेन मन्त्रितं तोय ग्रस्तस्य वदनेक्षिपेत् । सद्यस्तं मुञ्चति क्रन्दन् ग्रहो मन्त्रप्रभावतः ।३१ अमुना मन्त्रितान् बाणान् विमृजेद्युधि भूपतिः । जयेत्क्षणेन निखिलाञ् शत्रून्पार्थ इवापरः ।३२ वर्णान्त्यमोबिन्दुयुक्तं क्षेत्रपालाय हृन्मनः । ताराद्योवसुवर्णोऽयं क्षेत्रपालस्य कीर्तितः ।३३ षड् दीर्घभाजा बीजेन षडङ्गान्यस्य योजयेत् । ऋषिर्ब्रह्मा भवेदस्य गायत्रं छन्द ईरितम् ।३४ क्षेत्रपालो देवता चलायेति शक्तिरीरितः ।३५ मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित जल को जो भी ग्रस्त हो उसके मुख में डाल देवे। इस मन्त्र के प्रभाव से ग्रह तुरन्त ही रुदन करता हुआ उसका त्याग कर दिया करता है। इस मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित किये हुये बाणों को राजा यदि युद्ध में छोड़े यो वह दूसरे अर्जुन को ही भाँति अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लिया करता है ।३१-३२। अब क्षेत्रपाल के मन्त्र का सोद्धार वर्णन किया जाता है-वर्णान्त्ये- अः, औ-स्वरूप, हृत्-नमः यह पद, औ बिन्दु (अनुस्वार) से युक्त होता है। नमः इसके पूर्व क्षेत्रपालाय-यह पद होता है। इसके आदि में तार अर्थात् प्रणव होता है। यह क्षेत्रपाल का मन्त्र आठ वर्णों वाला होता है, ऐसा कीर्त्तित किया गया है।३३। इसके छै दीर्घों के भजन करने वाले बीज के अङ्ग को योजित करना चाहिये। इसका ऋषि ब्रह्मा है और इसका छन्द गायत्र कहा गया है।३४। इसका देवता क्षेत्र- पाल है और 'चलाय'-यह शक्ति कही गयी है ।३५। नीलाञ्जनाद्रिनिभमूर्द्ध्वपिशङ्गकेशं वृत्तोग्रलोचनमुपान्तगदाकपालम् । आशाम्बरं भुजगभूषणमुग्रदंष्ट्रं क्षेत्रेशमद्भुततनुं प्रणमामि देवम् ।३६