भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 409, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 409

सप्तदश पटल ] [ ४०६ देवं देवीः स्वबीजादि कनिष्ठादिषु विन्यसेत् । पादान्मूर्द्धाविधि न्यस्येन मुष्टिनावयवेषु तत् ।६१ तलाभ्यां व्यापकं कुर्यान्मूर्धादि चरणावधि । षडङ्गानि ततोन्यस्येद्यस्थानं विशालधीः ।६२ देवं देवी यथापूर्वं मूर्द्धास्यहृदयाम्बुजे । नाभौ गुह्ये क्रमान्न्यस्येतपश्चाद्देव विचिन्तयेत् ।६३ रक्ताभमिन्दुसकलाभरणं त्रिनेत्रं खट्वाङ्गपाशसृणिशूलकपालहस्तम् वेदाननं चिपिटनासमनर्घ्यभूषं रक्ताङ्गरागकुसुमांशुकमीशमीडे ।६४ लक्षमानं जपेन्मन्त्रं जुहुयात्सर्पिषाऽयतम् । वक्ष्यमाणे यजेत्पीठे देवमावरणैः सह ।६५ देव का–देवी का और स्वबीजादि का कनिष्ठ का आदि में न्यास करे । पाद से मूर्धा की अवधि तक मुष्टि से अवयवी में उनका न्यास करे ।६१। मूर्धा से आदि लेकर चरणों की अवधि पर्यन्त तलों से व्यापक न्यास करना चाहिए । विशाल बुद्धि वाले पुरुष को चाहिए कि वह इसके अनन्तर स्थान के अनुसार षट् अङ्गों का न्यास करे ।६२। देव का और देवी पूर्व की ही तरह से मूर्धा, मुख, हृदय कमल, नाभि; गुह्य क्रम से न्यास करना चाहिए । इसके पश्चात् इस प्रकार से चिन्तन करे ।६३। अब ध्यान बतलाया जाता है—रक्त आभा से युक्त, चन्द्रखंड के आभरण से भूषित—तीन नेत्रों वाले—करों में खट्वाङ्ग—पाश—सृणि— शूल और कपाल को धारण करने वाले—चार मुखों से समन्वित— चिपिटनासिका से युत—श्रेष्ठ वेषभूषा से भूषित—रक्त अङ्गराज से युत—कुसुमों के वस्त्रधारी ईश का स्तवन करता हूँ ।६४। एक लाख मान में इस मन्त्र का जप करे और जप का दशांश भाग दश सहस्र घृत से होम करे । आगे कहे जाने वाले पीठ पर आवरणों के साथ देव का यजन करे ।६५। नपुंसकस्वरैर्विद्वान्स्वराद्यन्तद्वयेन च । धर्मादिकानधर्माद्यान्पादगात्राणि विन्यसेत् ।६६