भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 410, कुल 511 में से

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४१० ] [ श्री शारदा तिलक इकारेण न्यसेत्पश्चात्तत्त्वरूपान्गुणानथ । शान्त्या तत्परवर्णेन मायाविद्यामजे क्रमात् ।६७ अधऊर्ध्वच्छन्दे न्यस्येदधीशेन ततोऽम्बुजम् । सन्ध्यक्षरैर्यजेन्मन्त्रों शक्तीर्वामादिकाः क्रमात् ।६८ वामां ज्येष्ठां तथा रौद्रीमिच्छां ज्वालास्वरूपिणीः । एवं प्रकल्पित पीठे मूर्ति मूलेन कल्पयेत् ।६६ आवाह्य पूजयेद्देवं तस्यामावरणैः सह । अङ्गावृत्तेर्बहिर्देवीं दिक्पत्रेषु समर्च्चयेत् ।१०० विद्वानों को उचित है कि नपुंसक स्वरों से और स्वराद्यन्त दो से धर्मादि काम धर्मियों तथा पादगात्रों का विन्यास करे ।६६। ईकार से न्यास करे और पीछे तत्व रूप गुणों को, शान्ति से तत्पर वर्ण के द्वारा क्रम से माया विद्यमय में नीचे ऊपर के छन्द में न्यास करे । अर्धीश से अम्बुज को करे । मन्त्रधारी शक्तियों और वामदिक का क्रम से यजन करे ।६७।६८। उन शक्तियों नामों का परिगणन करके बताया जाता है—वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, इच्छा, ज्वाला स्वरूपिणी हैं । इस प्रकार से प्रकल्पित पीठ पर मूल मन्त्र के द्वारा मूर्त्ति की कल्पना करनी चाहिए ।६६। उस मूर्त्ति में देव का आवाहन करके आवरणों के सहित पूजन करे । अङ्गावृत्ति के बाहर दिक् पत्रों में देवी का अर्चन करना चाहिए ।१००। जयाद्याः स्वस्वबीजेन रक्ता रक्तानुलेपनाः । अरुणांशुकपुष्पाढ्यस्ताम्बूलाऽऽपूरिताननाः ।१०१ बल्लकीवादनपरा मदमन्मथपीडिताः । ईशादिकोणेष्वभ्यचेद्दूतीबीजादिकाः क्रमात् ।१०२ दुर्भगां सुभगां भूयः करालीं मोहिनीमिमाः । बद्धाञ्जलिपुटाः किचिदानम्रवदनाम्बुजाः ।१०३ देवीः सदृशभूषाडया दूतीमन्त्राविदुः क्रमात् । चतुरः शादिकान्वर्णानिद्धेन्दुकृतशेरान् ।१०४

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