शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 408, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें४०० ] [ श्री शारदा तिलक से कलश को प्रतिष्ठापित करे । फिर इससे अभिषेक करे तो कृत्या और भूत द्रोह आदि को शान्ति प्रदाता होता है ।८५। स्वरावृतमयुङ् मनुं लिखतु टान्तमध्ये ततः । षडस्रिषु हुताशनं तदनु कादिवर्णैर्वृतम् । धरापुरयुगेन तन्नृहरिबीजयुक्तास्रिणा । प्रवेष्टितमुदाहृतं दुरितरोगकृत्यापहम् ।८६ क्षकारोमाग्निपवनवामकर्णार्द्धचन्द्रवान् । उक्तं तुम्बुरुबीज तद्येन सिध्यन्ति साधकाः ।८७ षड्दीर्घभाजा बीजेन ऽङ्गानिप्रकल्पयेत् । क्षकाररहितं बीजं क्रमाज्जभसहान्वितम् ।८८ चत्वारि देवीबीजानि देव्यो ज्ञेया इमाः क्रमात् । जयाख्या विजया पश्चादजितर चापराजिता ।८९ बीजमंगुलिषु न्यस्य करयोर्व्यापकंततः । कनिष्ठादिषु विन्यस्येत्षडङ्गानि तलावधि ।६० फिर टान्त के मध्य में स्वरों से आवृत अयुक् मन्त्र को लिखे । षट्कोण में हुताशन को लिखे फिर इसके अनन्तर कादिद वर्णों से इसको वृत करे । फिर दो भूपुरों से तथा नृसिंह के बीज से युक्त षट्कोण से इसको परिवेष्टित करे। यह दुरित रोग और कृत्या के दोषों का अप- हरण करने वाला उदामृत किया गया है ।८६। क्षकार, अग्नि, पवन, वाम, कर्ण अर्ध चन्द्र वाला—यह तुम्बुरु बीज कहा गया है जिसके द्वारा साधकगण सिद्ध होते हैं ।८७। छै दीर्घों से युक्त बीज के द्वारा छै अङ्गों की कल्पना करनी चाहिए । क्षकार से रहित बीज से क्रम से ज—भ—स—ह से अन्वित होता है ।८८। चार देवी के बीज होते हैं । उनको क्रम से जान लेने चाहिए । जया—विजया—अजिता—अपरा- जिता है । बीज का अँगुलियों में न्यास करके पीछे दोनों करों में व्यापक न्यास करना चाहिए । फिर कनिष्ठा आदि में तल की अवधि पर्यन्त षडङ्गों का न्यास करे ।८६।६०।