भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 421, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 421

अष्टादश पटल ] [ ४२१ वर्म्मास्त्रोल्लासिकोणे दहनपुरयुगे कल्पिते भूपुरस्थे यन्त्रेऽस्मिन्प्राग्विधानात्कृतकलशविधिः सर्वदुःखापहारी ।२३ षट्कोणे शक्तिरन्तः स्फुरयुगलवृत्ता प्रस्फुरद्वन्द्वकोणे शिष्टैर्मन्त्रस्य वर्णै रसकरणचतुः षट् चतुर्वेदवेदैः । षडङ्गैः कॢप्ताष्टपत्रं दहनपुरयुगेनावृतं वर्म स्फुटः राजत्कोणेन वीतं (वाह्यं) धरणिपुरयुगं यन्त्रमाघोरमेतत् ।२४ क्षुद्रचोरग्रहव्यालभूतापस्मारनाशनम् । यन्त्रमेतत्समाख्यातं सर्वसिद्धिप्रदातृकम् ।२५ क्रमसे घृतःअपामार्ग, पंचगव्य-हवि और घृतसे प्रत्येककी एक सहस्र आहुतियां देवे और सुधी एक पात्रसे घृतका सम्पात करे।२१।उस सम्पात के घृतसे साध्य व्यक्ति को भूतोंकी शान्तिके लिये भोजन करावे।२२।अब एक मन्त्र बतलाया जाता है । इसका उद्धार इस तरहसे होता है-मध्यमें साध्य के सहित शक्ति को जो स्वरगणसे सहित होवे लिखे और केसरों में अष्ट वर्णों का लेखन करे तथा पत्रों के अन्दर मन्त्र के वर्णों को लिखे। उसी भाँति अग्रदेशों में गुणमितों को लिखे । वर्म और अस्त्र से शोभित कोण में लिखे । भूपुर में स्थित दहनयुगों के युग में जो कि कल्पित किया गया होवे । इस मन्त्र में पूर्वोक्त विधान से कलश की विधि को करे तो यह मन्त्र सब दुःखों का अपहरण करने वाला होता है ।२३। अब अन्य मन्त्र को बतलाया जाता है-षट्कोण में शक्ति है और अन्दर स्फुरित युगल से वृत हो । फिर प्रस्फुर द्वन्द कोणमें आवृता होव । मंत्र के शिष्ट वर्णों से छै-करण-चार-सौ चार वेद वेदोंसे षडङ्ग क्लृप्त अष्टपत्र को जो दहन पुरयुग से आवृत्त वर्म हो स्फुट से शोभित कोणसे परिवीत करे और इसमें दो भूपुर होते है-यही अघोर मन्त्र होता है ।२४। यह मन्त्र क्षुद्र चोर ग्रह-व्याल भूत-अपस्मार का नाश करने वाला है और यह सब सिद्धियों का प्रदान करने वाला कहा गया है ।२५। तारोवान्तोधरासंस्थो वामनेत्रेन्दुभूषितः । पार्श्वोवकः कर्णयुतो वर्म्माश्वान्तः षडक्षरः ।२६