शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 422, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें४२२ ] [ श्रीशारदा तिलक मनुः पाशुपतास्त्राख्यो ग्रहक्षुद्रनिवारणः । षडभिर्वणैः षडङ्गानि हुंकडन्तैः सजातिभिः ।२७ मध्याह्नाकंसमप्रभं शशिधरं भीमाट्टहासोज्ज्वलम् । त्र्यक्षं पन्नगभूषणं शिखिशिखाश्मश्रुस्फुरन्मूर्द्धजम् । हस्ताब्जैस्त्रिशिखं समुद्गरमसिं शक्ति दधानं विभुम् । दंष्ट्रोमिच्चतु' मुख' पशुपति दिव्यास्त्ररूप स्मरेत् ।२८ वर्णलक्षं जपेन्मत्रं जुहुयात्तद्दशांशतः । गव्येन सर्पिषा मन्त्री संस्कृते हव्यवाहने ।२६ शैवे पीठे यजेद्देवं प्राङ्गैरष्टमातृभिः । इन्द्र दिभिर्लोकपालै र्थज्राद्यै रायधैस्ततः ३० अब पाशुपतास्त्र को बताते हैं तार-प्रणव व्यक्त-शकार, धरा-ल, उसमें स्थित वामनेत्र-ई, इन्दु-अनुस्वार त भूषित है। पार्श्व पः, वकः-- श, कर्णयुत-उकार से संयुत, वर्मास्त्रान्तः षट् अक्षरों वाला है ।२६। यह पाशुपत नामक मन्त्र ग्रहों और क्षुद्रों के निवारण करने वाला होता है । जिसके अन्त में हुँ फट् हो ऐसे सजाति छै वर्णों से छ अङ्गों को करना चाहिए ।२७। अब ध्यान बताया जाता है मध्याह्न काल के सूर्य के समान प्रभा से समन्वित-चन्द्रदेव को धारण करने वाले-परम भीषण अट्टाहास से समुज्ज्वल-तीन नेत्रों से युक्त- सर्पों के भूषणों से संयुत की शिखा के समान श्मश्रु तथा स्फुरित केशों से युक्त हस्त कमलों के द्वारा त्रिशिख सुन्दर-असि और शक्ति का धारण करने वाले विभु का जो दाढों के द्वारा परम भीषण चार मुखों वाले-दिव्य अस्त्र स्वरूप पशुपति प्रभु का स्मरण करना चाहिये ।२८। इस मन्त्र में जितने वर्ण होवे उतने ही लाख इस मन्त्र का जप करना चाहिये । और जप के दशांश भाग का गाय के घृत से होम करे और मन्त्रधारी पुरुष को संस्कार किये हुये अग्नि में ही हवन करना चाहिये ।२६। शैव पीठ पर देव का यजन करे जो प्राक् अङ्ग, अष्ट मातृका-इत्यादि देवगण, लोकपाल और उनके वज्रादि आयुधों के