भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 423

अष्टादश पटल ] [ ४२३ साथ ही यजन करे, तात्पर्य यह है कि सबका पूजन करना चाहिये।३०। अनेन मन्त्रितं तोय ग्रस्तस्य वदनेक्षिपेत् । सद्यस्तं मुञ्चति क्रन्दन् ग्रहो मन्त्रप्रभावतः ।३१ अमुना मन्त्रितान् बाणान् विमृजेद्युधि भूपतिः । जयेत्क्षणेन निखिलाञ् शत्रून्पार्थ इवापरः ।३२ वर्णान्त्यमोबिन्दुयुक्तं क्षेत्रपालाय हृन्मनः । ताराद्योवसुवर्णोऽयं क्षेत्रपालस्य कीर्तितः ।३३ षड् दीर्घभाजा बीजेन षडङ्गान्यस्य योजयेत् । ऋषिर्ब्रह्मा भवेदस्य गायत्रं छन्द ईरितम् ।३४ क्षेत्रपालो देवता चलायेति शक्तिरीरितः ।३५ मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित जल को जो भी ग्रस्त हो उसके मुख में डाल देवे। इस मन्त्र के प्रभाव से ग्रह तुरन्त ही रुदन करता हुआ उसका त्याग कर दिया करता है। इस मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित किये हुये बाणों को राजा यदि युद्ध में छोड़े यो वह दूसरे अर्जुन को ही भाँति अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लिया करता है ।३१-३२। अब क्षेत्रपाल के मन्त्र का सोद्धार वर्णन किया जाता है-वर्णान्त्ये- अः, औ-स्वरूप, हृत्-नमः यह पद, औ बिन्दु (अनुस्वार) से युक्त होता है। नमः इसके पूर्व क्षेत्रपालाय-यह पद होता है। इसके आदि में तार अर्थात् प्रणव होता है। यह क्षेत्रपाल का मन्त्र आठ वर्णों वाला होता है, ऐसा कीर्त्तित किया गया है।३३। इसके छै दीर्घों के भजन करने वाले बीज के अङ्ग को योजित करना चाहिये। इसका ऋषि ब्रह्मा है और इसका छन्द गायत्र कहा गया है।३४। इसका देवता क्षेत्र- पाल है और 'चलाय'-यह शक्ति कही गयी है ।३५। नीलाञ्जनाद्रिनिभमूर्द्ध्वपिशङ्गकेशं वृत्तोग्रलोचनमुपान्तगदाकपालम् । आशाम्बरं भुजगभूषणमुग्रदंष्ट्रं क्षेत्रेशमद्भुततनुं प्रणमामि देवम् ।३६