शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 417, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टादश पटल ] [ ४१७ अष्टादश पटल ॥ अघोरास्त्रो वर्णन ॥ अथाभिधास्ते विधिवदघोरारास्रमनुत्तमम् । यस्य संस्मरणादेव सर्वे नश्यन्त्युपद्रवाः ।१ माया स्फुरद्वय भूयः प्रस्फुरद्वितयंततः । घोरघोररतरेत्यन्ते तनुरूपपदं पुनः ।२ चटयुग्मं तदन्तेस्यात्प्रचटद्वितयं ततः । कहयुग्मं वमद्वन्द्वं ततो बन्धयुगं पुनः ।३ घातयद्वितयं वर्म फडन्तः समुदाहृतः । एकपञ्चाशदक्षोऽयमघोरास्त्रमहामनुः ।४ अघोरारोऽस्य मुनिः प्रोक्तश्छन्दस्त्रिष्टुबुदाहृतम् । अघोररुद्रः संदिष्टो देवता मन्त्रवित्तमैः ।५ इसके अनन्तर परमोत्तम अघोरास्त्र के विषय में वर्णन करूँगा ' जिसके संस्मरण मात्र से ही सब उपद्रव नष्ट हो जाया करते हैं।१। मन्त्र का उद्धार करके बताया जाता है—माया शक्ति बीज, दो बार 'स्फुट'—यह पद, इसके पश्चात् 'प्रस्फुट'—यह पद दो बार कहे, घोर घोरतर'—इस पद के पश्चात् 'तनुरूप'—यह पद कहे ।२। इसके अन- न्तर दो बार 'चट'—इस पद को बोले और इसके अनन्तर दो बार 'प्रचड'—इस पद का उच्चारण करना चाहिए । इसके उपरान्त दो बार 'कह'—यह पद और 'वम'—यह दो बार कहे। फिर 'बन्ध' को दो बार कहे और 'घातय' इसको दो बार कहे । फिर वर्म और फट् कहे । यह मन्त्र बताया गया है। यह अघोरास्त्र मन्त्र इक्यावन वर्णों का होतो है, जो यहाँ पर बताया गया है ।३-४। इस मन्त्र का ऋषि अघोर होता है और इसका छन्द अनुष्टुप गया है। मन्त्रों के शनि