शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४१८ ] [ श्रीशारदा तिलक रखने वाले पुरुषों के द्वारा इस मन्त्र का देवता अघोर रुद्र ही बताये गये हैं ।५। हृदय पञ्चभिः प्रोक्तं शिरः षड्भिरुदाहृतम् । शिखा दशभिराख्याता तावद्भि कवच मतम् ।६ वसुवर्णैः स्मृतं नेत्रं मासार्णैरस्त्रमीरितम् । मूर्द्धनेत्रास्य कण्ठेषु हृन्नाभ्यन्धूरुषु क्रमात् ।७ जानुजंघापदद्वन्दे रुद्राभिन्नाक्षरैर्न्यसेत् । पञ्चभिश्चपुनः षड्भिर्द्वाभ्यामष्टभिरक्षरैः ।८ चतुर्वर्णैः षडूर्णे श्च करणेः करणे पुनः । चतुर्भिः षड्भिरक्षिभ्यां वर्णभेदोऽयमीरितः ।६ सजलघनसभाभं भीमदंष्ट्रं त्रिनेत्रं भुजगधरमघोरं रक्तवस्त्रङ्गरागम् । परशुडमरुखड्गान्खेटक वाणचापौ त्रिशिखनरकपाले विभ्रतं भावयामि ।१० इसका हृदय पाँचों से बताया गया है और छै से इसका शिर कहा गया है । इसकी शिखा दश से बतायी गयी है और उतनी ही से इसका कवच माना गया है ।६। आठ वर्णों से इसका नेत्र कहा है और बाहर वर्णों के द्वारा इसका अस्त्र बताया गया है इसका न्यास क्रम से मूर्धा नेत्र-मुख-कण्ट-हृदय-नाभि--अन्धु-उरुओंमें-जानु-जंघा और दोनों चरणोंमें रुद्र से भिन्न अक्षरों के द्वारा करना चाहिए । फिर पाँचों से, छै से, दो से, आठ अक्षरों से, चार वर्णों से, छै वर्णों से और फिर चार करणों और छै अक्षियों करे । यह वर्ण भेद कहा गया है ।७।८।६। अब ध्यान करने की रीति बतलायी जाती है—ध्यान—जल के सहित मेघों की आभा के समान आभा से समन्वित—महान् भीषण दाढ़ों से युक्त—तीन नेत्रों वाले—सूर्योको अपने शरीर पर धारण करने वाले— रक्त वस्त्र के तुल्य अङ्गराग से संयुत—अपने कर कमलों में परशु—