भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 419, कुल 511 में से

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अष्टादश पटल ] [ ४१६ डमरू—खङ्ग—खेटक—वाणचाप—त्रिशिख—नर, कपाल को धारण करने वाले अघोर की भावना करता हूँ ॥१०॥ अभिचारे ग्रहध्वंसे कृष्णवर्णो भवेद्विभूः । वश्ये कुसुमभसङ्काशो मुक्तौ चन्द्रमप्रभः ॥११ लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं घृत सक्तोस्तलंः शुभैः । तद्दशांशं प्रजुहुयान्मन्त्री मन्त्रस्य सिद्धये ॥१२ शैवे सम्पूजयेत्पीठे षट्कोणान्तः स्थपङ्कजे । अ गपूजां केसरेषु कृत्वा पत्रेषु तत्परम् ॥१३ परशुं डमरुं खड्गं खेट बाण च (णांश्च) कार्मुकम् । शूलं कपालां प्रयजदष्टास्त्राण्यस्य देशिकः ॥१४ दलाग्रेषु ततः पूज्या ब्राह्मयाद्याः प्रोक्तलक्षणा । लोकेशान्पूजयेत्पश्चादायुधैः स्वैः समन्वितान् ॥१५ अभिचार में-ग्रहों के ध्वंस में विभु का कृष्ण वर्ण होता है । वश्य के प्रयोग में विभु का वर्ण कुसुम्भ के सदृश हुआ करता है और मुक्ति में उसका वर्ण चन्द्र के समान प्रभा से संयुत होता है ॥११॥ इस मन्त्र का एक लाख जाप करना चाहिए और घृत सिद्ध परम शुभों तिलों से जप का दशांश भाग का होम करे ।। तभी मन्त्रधारी को मन्त्रकी सिद्धि होती है ॥१२। शैव पीठ पर षट्कोण के अन्दर स्थित कमल अच्छी तरह से यजन करना चाहिए । अङ्गों की पूजा केसरों में करके फिर पत्रों आयुधों का अर्चन करे जिनके नाम ये हैं—परशु, डमरू, खड्ग, खेट, बाण, कार्मुक, शूल, कपाल ॥१३॥१४। दलों के अग्रभागों में इसके अनन्तर ब्राह्म्यादि का यजन करना चाहिये जिनके लक्षण पूर्व में ही कह दिये गये हैं । इनके पश्चात् लोकपालों का अर्चन करे जो कि वज्रादि अपने-अपने आयुधों के सहित है ॥१५। इति पूजाविधिः सिद्धे मन्त्रेणानेन साधकः । इष्टान्नप्रयोगान्कुर्वीत सिद्ध्यन्ते नात्र संशयः ॥१६

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