शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 416, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें४१६ ] [ श्री शारदा तिलक पञ्चकूरान्धसा वाह्यै ततो भूतबलि हरेत् । एवं पूजादिभिः सिद्धै मन्त्रै मन्त्रविदाम्बरः ।१३४ नाशयेत्सकलान्भूतान्कृत्याग्रहमहाभयान् । आदेश तस्य कुर्वन्ति भूता भीता महात्मनः ।१३५ बहुना किमिहोक्तेन मन्त्रेणानेन भूतले । सदृशोनास्ति मन्त्रोऽन्योभूतनिग्रहसाधने ।१३६ रौद्र पिंगल नामों वाले दो और श्मशान विभीषण वाले दो दृढ़- कर्ण और भृंगि-रीटिका उत्तर में पुनः समर्चन करना चाहिये ।१३१। फिर इसके अनन्तर आमर्दक-महाकाल और फिर कोण पालों का यजन करे । कुम्भकर्ण—अशोक नामक भल्लाटक और सिहरक का अर्चन करना चाहिए ।१३२। इसके अनन्तर इन्द्रदेव आदि लोक पालों का जो अपने २ आयुधों के सहित होवें पूजन करे । धूप-दीप आदि पूजन के उपचारों के द्वारा देवेश्वर महेश्वर प्रभु का प्रीणन करना चाहिए ।१३३ बाहिर में पञ्च कूरान्ध से भूत बलि का पीछे आहरण करे । इस रीति से पूजादि के द्वारा मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर मन्त्रों के ज्ञान रखने वालों में परम श्रेष्ठ पुरुष समस्त भूतों का तथा कृत्या के ग्रहों का और महान् पापों का विनाश कर दिया करता है । उस महान् आत्मा वाले पुरुष से फिर भीत होकर भूतगण आज्ञा का पालन करते हैं ।१३४- १३५। इस मन्त्र के विषय में यहाँ पर बहुत अधिक कहने का क्या प्रयोजन है बस इतना ही कहना पर्याप्त है कि इस भू-मण्डल में इस मन्त्र की समानता रखने वाला भूतों के विग्रह करने के साधन में अन्य कोई दूसरा मन्त्र ही विद्यमान नहीं है ।१३६।