शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 415, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तदश पटल ] [ ४१५ उसकी सिद्धि के लिए घृत से अक्त पायस से होम करना चाहिए । १२५। पंचाक्षर के उदित पीठ पर खङ्ग रावण का अर्चन करे । बीज के द्वारा मूर्त्ति की कल्पना करनी चाहिए । उसका कान्त मन्त्र से युक्त है । । १२६। अङ्गानि दलमूलेषु दूतीः पत्रेषु संयजेत् । चुलुकुण्डां प्रज्वलिनीं तृतीयां कृष्णपिङ्गलाम् । १२७ फल्गुनीं टिरिटिल्लीं च पञ्चमी मन्त्रमालिकाम् । सप्तमीं शंखिनीं पश्चाच्चन्द्राङ्कितजटामिमाः । १२८ पूर्वपत्रादि सव्येन खडगरावणवल्लभाः । ऐन्द्री कौमारिकी ब्राह्मी वाराहीं वैष्णवीं पुनः । १२६ वैनायकीं च चामुण्डां माहेशीं दिक्षु पूजयेत् । द्वारपालान्यजेद्दिक्षु द्वौ द्वौ प्रागादिदेशिकः । १३० अङ्गों का दलों के मूलों में और दूतियों का पत्रों में भली भाँति यजन करना चाहिए । अब उनके नामों का परिगणन करके बताया जाता है, चुलुकुण्डा, प्रज्वलिनी और तीसरी कृष्ण पिङ्गला है । १२७। फल्गुनी, टिरिटिल्ली पाँचवी और छठी मन्त्रमालिका है । सप्तमी शंखिनी—और चन्द्रांकित जटा है । ये पूर्व पत्रादि सव्य में खड्ग रावण की वल्लभायें हैं । इनके पश्चात् ऐन्द्री, कौमारिका, ब्राह्मी, वाराही, वैष्णवी, वैनायिकी, चामुण्डा और माहेशी का दिशाओं में अर्चन करना चाहिए । फिर आचार्य द्वारा पूर्व आदि दिशाओं में दो-दो द्वारपालों का यजन करना चाहिए । १२८-१३०। रौद्रपिङ्गलनामानौ द्वौ श्मशानविभीषणौ । दृढकर्ण भृङ्गिरीटिमुदीच्यामर्चयेत्पुनः । १३१ आमईकमहाकालौ कोणपालान्यजेत्पुनः । कुम्भकर्णमशोकाख्यं भल्लाटं च सिहारकम् । १३२ इन्द्रादिकाँल्लोकपालान्सायुधान्पूजयेत्ततः । धूपदीपादिभिर्देवं प्रीणयित्वा महेश्वरम् । १३३