शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४१४ ] [ श्री शारदा तिलक यह पद लिखे । इसके आगे 'चल-चल' और 'अनिवर्त्त कपालिने'-हन- हन-भूतान् त्रासय-यह लिखे । फिर मण्डप के मध्य में- 'फट्-फट्' और रुद्राङ्कुशेन 'शमय-प्रवेशाय' का युग्म लिखे । फिर 'खण्डासि' पद कहे । धराधिपति रुद्रो ज्ञापय-यह लिखकर 'स्वाहा लिखना चाहिए । यह खङ्ग रावण मन्त्र है जो एक सौ सत्तर अक्षरों वाला है । भूताधिपतये स्वाहा पूजामन्त्रोऽयमीरतः । सद्यादिपञ्चह्रस्वाड्यकान्तबीजादिकान्न्यसेत् ।१२२ ईशानाद्याः पञ्चमूर्तीर्देहे वक्त्रेषु च क्रमात् । षड्दीर्घविन्दुयुक्तेन मन्त्रे नाङ्गक्रिया मता ।१२३ घण्टाकपालसृणिमुण्डकृपाणखेटखट्वाङ्गशूलडमरूनभयन्दधानम् । रक्ताङ्गमिन्दुशकलाभरणं त्रिनेत्र पञ्चाननाब्जमरुणांशुकमीशमीडे । ॥१२४ अयुतद्वितयं मन्त्रं जपित्वा तद्दशांशतः । पायसेन घृता यक्तेन जुहुत्तस्यसिद्धये ।१२५ पञ्चाक्षरोदिते पीठे पूजयेत्खङ्गरावणम् । बीजेन मूर्तिक्लृप्तिः स्यात्तत्कान्तं मनुविन्दुमतू ।१२६ भूताधिपतये स्वाहा-यह पूजा मन्त्र कहा गया है। सद्य जिनके आदि में होवे ऐसे पंचह्रस्व से आढ्य कान्त बीजादिक का न्यास करे । ।१२२। ईशानाद्य पांच मूर्त्तियों का देह में और वक्त्रों में क्रम से षड्- दीर्घ विन्दु से युक्त मन्त्र से इसकी अङ्गों की क्रिया मानी गई ।१२३। अब ध्यान का प्रकार बतलाया जाता है-घण्टा, कपाल, सृणि-मुण्ड कृपाल, खेट, खट्वाङ्ग, शूल, डमरू और अभयदान को धारण करने वाले-रक्ताङ्ग और चन्द्रमा के खण्ड के आभरणों से अलंकृत-तीन नेत्रों से संयुत-पांच मुख कमलों से समन्वित-अरुण वर्ग के वस्त्रों को धारण करने वाले ईश का मैं स्तवन करता हूँ ।१२४। इस मन्त्र का दो अयुत अर्थात बीस सहस्र जप करे और फिर जप का दशांश भाग का