शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 413, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तदश पटल ] [ ४१३ श्मशानभस्मार्चितान्ते शरीराय ततः परम्। घण्टाकपालमालावि धरायति पदं पुनः ।११६ व्याघ्रचर्मपदस्यान्ते परिधानाय तत्परम् । शशाङ्ककृतशब्दान्ते शेखराय ततः परम् ।११७ कृष्णसर्पपद पश्चात्ततो यज्ञोपवीतिने । चलयुग्मं वल्गुगमनिवर्तकपालिने ।११८ हनयुग्मं ततो भूतान त्रासयद्वितयं पुनः । भूयो मण्डलमध्ये स्यात् कट्टयुग्मं ततः परम् ।११९ रुद्राङ्कुशेन शमय प्रवेशययुगं तत । आवेशययुगं पश्चाच्चण्डासिपदमीरयेत् ।१२० धराधिपतिरुद्रोऽथ ज्ञापयत्यग्निसुन्दरी । खडगरावणमन्त्रोऽयं सप्तत्यूर्ध्वशताक्षरः ।१२१ अब मन्त्र बतलाया जाता है—आठ दलों से समन्वित कमल की रचना करके उसकी कर्णिका में मूल का लेखन करके दिशाओं के दलों में देवी के बीजों को तथा विदिशाओं में दूतों बीजों को लिखना चाहिए। क्रम से ही अर्थात् पूर्व की ही रीति से लिखे। ककार से आदि वर्णों के द्वारा उसे बीत करे तथा बाहर में भूपुर की रचना करके उससे परि- वीत करे। यह मन्त्र ऐसा ही बताया गया है जो समस्त सुखों का प्रदान करने वाला है और रोगों का तथा कृत्या के गृहों का विनाश करने वाला है ।११३। अब खङ्ग रावण मन्त्र बतलाया जाता है-प्रणव हृदय और इसके पीछे चतुर्थी विभक्ति जिसके अन्त में होवे ऐसा पशु- पति'-पद लिखे। फिर तार—प्रणव, फिर भूत अधिपति और ध्रुव अर्थात् प्रणव लिखे। इसके पीछे 'नमो रुद्राय' इसका युगल लिखे। खग रावण शब्द से 'विरहा' का युगल लिखें। फिर 'नृत्य' पद का युगल लिखे। इसके अनन्तर 'श्मशान भस्मार्चित शरीराय' - और 'घंटा कपाल माला धराय'-यह पद कहे। इसके पश्चात् 'व्याघ्र चर्म परिधानाय' और 'शशांक कृत शेखराय'-यह लिखे। इसके अनन्तर 'कृष्ण सर्प यज्ञोपवीतिने