शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 412, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें४१२ ] [ श्री शारदा तिलक भूतकृत्याग्रहद्रोहशान्तिदः संपदावहः । अभिषेकोऽयमाख्यातो राज्ञां विजयवर्द्धनः ११२ उस पुरुष को तीनों लोकों में कुछ भी वस्तु अप्राप्य नहीं है। वायु वह्निपुर के अन्दर स्थित बीज को स्मरण करके अनन्य बुद्धि वाला होकर जप करे तो उसके ज्वर भूत महा रोग उसी क्षण में नष्ट हो जाया करते हैं। क्रुद्ध का हृदय में ध्यान करके अनन्य बुद्धि होकर बीज का जप करे ।१०६।१०७। इस मन्त्र के प्रभाव से वह शीघ्र ही वश्य हो जाता है। हृद्रोग में-कामला रोग में विष्टम्भ श्वास और कास में-इस मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित जल को प्रातःकाल में रोग की शान्ति के लिए पान करना चाहिए। नव पदों के स्वरूप वाले मंडल की रचना करके उसमें परम शोभन पूर्व में वर्णित नौ कलशों की मन्त्रधारी स्थापना करे। मध्य में देव का यजन करे और पूर्वादि कुम्भों में स्थित देवियों का अर्चन करे ।१०८।१०६।११०। कोणों में स्थित दूतियों का अर्चन करके पतिव्रता स्त्री अभिषिञ्चन करे ! वह नारी अवश्य ही पुत्र जन्म का लाभ किया करती है, चाहे वह वन्ध्या ही क्यों न हों औरों की तो बात ही क्या है ।१११। यह अभिषेक भूत-कृत्या द्रोह को शांति देने वाला होता है तथा सम्पदाओं का आवाहन किया करता है और राजाओं की विजय का वर्धन करने वाला है ।११२। अन्तर्बीजं स्वरगणलसत्केसरं तस्य बाह्ये । देवीदूतीमनुयुतदलं दिग्विधिक्षु क्रमेण ॥ काद्यैर्वर्णैर्वृतमथ वह्निभूमिगेहेन वीतम् । यन्त्रं प्रोक्तं सकलसुखदं रोगकृत्याग्रहघ्नम् ।११३ प्रणवो हृदयं पश्चात्तु ङेऽन्तं पशुपति पुनः । तारो नमोभूतपदं ततोऽधिपतये ध्रुवम् ।११४ नमो रुद्राय युगलं खड्गरावणशब्दतः । विरहद्वितयं पश्चात्सरनृत्ययुगं पृथक् ।११५