शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४०६ ] [ श्री शारदा तिलक और वशी विभाग करके उसमें हवन करे तो इसी के द्वारा तीन दिन में ही साध्य उसके वश गत हो जाया करता है ।७२।७३। मकार गत साध्य के नाम को अनलस्थ गद नाम वाले चन्द्रगत को चतुरस्र (चौकोर) टान्त कोण से वेष्टित करे ।७४। बीज को ताम्बूल के पत्ते में स्थित कर के इस मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित करे। फिर इसका भक्षण करे तो यह शिर के रोग का अच्छी तरह से विनाश कर दिया करता है-इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।७५। बन्धु जीव के द्वारा बीज से गर्भित त्रिकोण लिखकर इसमें वह्नि का समाधान करे और अच्छी रीति से देवता की अराधना करनी चाहिए ।७६। जुहुयात्कृतसंपातं सर्पिषाष्टोत्तरं शतम् । संपाताज्येन संसिक्ता त्रिलोहकृतमुद्रिका ।७७ विधृता भूतवेतालकृत्यारोगविनाशिनी ।७८ ऊर्ध्ववह्निदहितं मनुमेनं वह्निगेहयुगलोपरि लिखितम् । अग्निमस्त्रिषु महीपुरवीतं यन्त्रमेतदुदितं ग्रहगौरि ।७९ अग्निबीजलत्कोणत्रिकोणलिखिते ध्रुवे । शरावे कपिलाज्यान्वज्सूत्रदीपं प्रविन््यसेत् ।८० घटेनैनं पिधायास्य पृष्ठे यन्त्रमिदं लिखेत् । भूतार्तमत्र संस्थाप्य चिन्तामणिमनुं जपेत् ।८१ फिर घृत से अष्टोत्तर शत कृत सम्पात आहुतियां देवे । उस सम्पात किये हुए घृत से संसिक्त करके तीनों लोहों की मुद्रिका बनावे । इस मुद्रिका को धारण करने से यह भूत, वेताल, कृत्या के द्वारा हुए रोगों का विनाश हो जाता है ।७८। अब एक यन्त्र बतलाया जाता है- ऊर्ध्व वह्नि से रहित इस मन्त्र को वह्नि गेह युगल के ऊपर लिखे षट्कोणों में अग्नि को भूपुर से वीत करे । यह मन्त्र ग्रह गौरि नाम वाला कहा गया है ।७९। अग्नि बीज से शोभित कोण त्रिकोण में ध्रुव के लिखने पर मिट्टी के दिये में कपिला गौ के घृत में अब्ज सूत्र वाले