भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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सप्तदश पटल ] [ ४०५ चन्द्रगत बीज क्रम से सोलह स्वरों से वीत होवे तो गलत्पर सुधा से पूर्ण नेत्र में ध्यान किये जाने पर यह नेत्र के रोग का हरण किया करता है ।६७। इस रीति से स्मरण किया हुआ बीज जो कि कुक्षि में किया जावे तो यह शूल आदि रोगों का हरण करने वाला हुआ करता है । स्फोट में, विष ज्वर में, दाह में, मोह में, शीर्ष के रोग में, भ्रम में इस बीज का ठीक उसी भाँति से ध्यान किया जाने पर उन-उन सम्पूर्ण क्लेशों का विनाश कर दिया करता है। यह बीज कुंकुम की समान आभा वाला त्रिकोण में गत उज्ज्वल है ।६८।६६। मन्त्रधारी पुरुष जिसके ही मूर्धा में इसका स्मरण अर्थात् ध्यान करे वही पुरुष थोड़े ही समय में वश्य हो जाया करता है। यहाँ हर ६७ वे श्लोक में जो चन्द्रगत है उसका आशय ठकार गत होता है। ऊर्ध्व रेफ गत साध्य के नाम वाली बीज वह्निगृह में स्थित हैं ।७०। दो वह्निगेह से युक्त अग्नि युक्त कोण से संवृत तथा प्रतिलोम स्वरों से आवृत को चूल्हे के स्थान में निवेशित कर देवे ।७१। वशीकरोति रमणमचिरेणैव दासवत् । मधुरत्रययुक्तेन शालिपिष्टेन पुत्तलीम ।७२ कृत्वा प्रतिष्ठितप्राणां विभज्य जुहुयाद्धशी । त्रिवासरमनेनैव साध्यस्तस्य वशी भवेत् ।७३ मकारगतसाध्याख्यमनलस्थगदाह्वयम् । चन्द्रगञ्चतुरस्रेण तान्तकोणेन वेष्टितम् ।७४ बीजं ताम्बूलपत्रस्थं प्रजप्तं मनुनामुना । भक्षितं नाशयेत्सम्यक् शिरोरोगं न संशयः ।७५ लिखित्वा बन्धुजीवेन त्रिकोणं बीजगर्भितम् । अत्र वह्निं समाधाय सम्यगाराध्य देवताम् ।७६ इसका ऐसा अद्भुत प्रभाव हो ताकि यह रमण को अपने दास की ही भाँति थोड़े समय में वश में कर दिया करता है। तीन मधुरों से युक्त शाली के चून से पुतला बनावे और उसमें पुष्पों की प्रतिष्ठा करे