शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 425, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टादश पटल ] सोपदंशं बृहत्पिण्ड कृत्वा रात्रिषु साधकः ! स्मृत्वा यथोक्तं क्षेत्रेशं तस्य हस्ते बलिं हरेत् ।४४ बलिनानेन सन्तुष्टः क्षेत्रपाल प्रयच्छति । कान्तिमेधावला रोग्यतेजः पुष्टियशः श्रियः ।४५ परिवार के सहित उनके लिए इसके द्वारा वलि का निर्हरण करे । पूर्व में 'एहि'--इस पद को दो बार कहे पश्चात् विदुषी पुरु-इसको दो बार बोले । भञ्जय--इसको दो बार 'नर्त्तय'--इसको दो बार कहे । फिर विघ्न पद को दो बार कहे । इसके आगे महाभैरव'--यह पद कहे । इसके अनन्तर क्षेत्रपाल बलि 'गृह्ण' इस को दो बार कहकर अन्त में पावकसुन्दरी 'स्वाहा'--वह पद कहे । यह बलि देने का मन्त्र कहा गया है जो समस्त मनो कामनाओं के फलों का प्रदान करने वाला होता है । ।४१-४३। उपदंश अर्थात् व्यंजन के सहित का एक बहुत बड़ा पिण्ड बनाकर रात्रि के समय में साधक जैसा उनका स्वरूप बताया गया है वैसे ही स्वरूप वाले क्षेत्रपाल का स्मरण करके हाथ में बलि देवे ।४४। इस बलि से परम सन्तुष्ट होकर क्षेत्रपाल कान्ति, वन, आरोग्य तेज पुष्टि, यश और श्री को प्रदान किया करते हैं । ४५। उद्धरेद्वटुकं ङेऽन्तं आपदुद्धारणं तथा । कुरुद्वयं पुनर्ङेऽन्तं वटुक्रान्तं समुद्धरेत् ।४६ एकविंशत्यक्षरात्मा शक्ति ब्दो महामनुः । अभीष्टफलसंसिद्ध्यै कीर्तितः सुरपादपः ।४७ बृहदारण्यक ऋषिश्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम् । आपदुद्धारणो देवो भैरवो देवता बुधैः ।४८ अङ्गुलीदेहवक्त्रेषु मूर्तीर्न्यस्येद्यथापुरा । सद्यादिपञ्चह्रस्वाढयशक्तिबीजपुरः सरम् ।४६ बकारं पञ्चह्रस्वाढयमीशानादिषु योजयेत् । षड्दीर्घयुक्तया शक्त्या वकारेण च तद्वता ।५०