शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 426, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें४२६ ] [ श्रीशारदा तिलक अङ्गानि जातियुक्तानि प्रणवाद्यानि कल्पयेत् । तस्य ध्यानं त्रिधा प्रोक्तं सात्विकादिविभेदतः ।५६ अब आपदुद्धारण मन्त्र बतलाया जाता है चतुर्थी विभक्ति के अन्त वाले वटुक' का उद्धार करे फिर आपदुद्धारण'-इस पद को कहे । फिर दो बार 'कुरु'-उस पद को कहे । फिर चतुर्थ्येन वटु कान्त का उद्धार करे ।४६। यह महामन्त्र शक्ति से रुद्ध इक्कीस अक्षरों वाला होता है। यह मन्त्र मनोभीप्सित फल की सिद्धि के लिये सुरपादप अर्थात् कल्पवृक्ष कहा गया है-कल्पवृक्ष का यह प्रभाव होता है कि उसके सामने जो भी व्यक्ति मन में सोचता है वही सिद्ध हो जाया करता है । ऐसा ही इस मन्त्र का प्रभाव होता है ।४७। इस मन्त्र का वृहदारण्यक ऋषि है और इसका छन्द अनुष्टुप् कहा गया है। बुधों के द्वारा इनका देवता आपदुद्धारण भैरव कहा गया है ।४८। पूर्व की तरह अङ्गुली-देह मुख के द्वारा इसकी मूर्त्तियों का न्यास करना चाहिये । सद्यादि पांच ह्रस्वों से आढ्य शक्ति बीज के पूर्वक पञ्चह्रस्वाढ्य वकार को ईशान आदि में योजित करे । षड् दीर्घों से युक्त शक्ति से और वैसे ही वकार से प्रणवाद्य जाति युक्त षट् अङ्गों की कल्पना करनी चाहिये । सात्विक आदि भेदों से उसका ध्यान भी तीन प्रकार का कहा गया है ।४६-५१। वन्देबालं स्फटिकसदृशं कुन्तलोल्लासिवक्त्रम् । दिव्याकल्पैर्नवमणिमयैः किंकिणीनूराद्यैः । दीप्ताकारं विशदवसनं सुप्रसन्नं त्रिनेत्रम् । हस्ताब्जाभ्यां बटुकमनिशं शूलदण्डौ दधानम् ।५२ उद्यद्भास्करसन्निभं त्रिनयनं रक्ताङ्गरागस्रजम् । स्मेरास्यं वरदं कपालमभयं शूलं दधानं करैः । नीलग्रीवमुदारभूषणशतं शीतांशुचूडोज्ज्वलं बन्धूकारुणवाससं भयहरं देवं सदा भावये ।५३