शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 428, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें४२८ ] [ श्रीशारदा तिलक राजसन्ध्यानमाख्यातं धर्मकामार्थसिद्धिदम् । तामस शत्रुशमन कृत्याभूतग्रहा (गदा) पहम् ॥५६ वर्णलक्ष जपेन्मन्त्रं हविष्याशी जितेन्द्रियः । तद्दशांश प्रजुहुयात्तिलैर्मधुरसंयुतैः ॥५७ धर्माधर्मादिभिः कल्पते पीठे पङ्कज शोभिते। षट्कोणान्तस्त्रि कोणस्थव्योम पङ्कजसंयुते ॥५८ वटुक तजयेद्देवं मूर्ति मूलेन कल्पयेत् । सद्योजातेन मन्त्रेण देवमावाहयेत्ततः ॥५९ मूलादिवामदेवेन स्थापयेत्परमेश्वर । मूलमन्त्रेण कर्त्तव्यं सान्निध्यं तदनन्तरम् ।६० दूसरा राजस ध्यान है। यह धर्म--काम और अर्थ की सिद्धि का प्रदाता होता है, ऐसा कहा गया है। तीसरा तामस ध्यान है। यह शत्रुओं के शमन करने वाला होता है ओर कृत्या, भूत, महाग्रहों के अवहनन करने वाला है ।५६। इस मन्त्र में जितने वर्ण हैं उतने ही लाख इस मन्त्र का जप करना चाहिये और जप करने वाले व्यक्ति को हविष्य का अशन करने बाला तथा इन्द्रियों को जीतकर रखने वाला होना चाहिए। जप का दशवां भाग मन्त्र द्वारा मधुरों से संयुत तिलों के द्वारा हवन करे। धर्माधर्मादि से कल्पत पर जो पंकजों से शोभित होवे और जो षट्कोण के अन्दर स्थित त्रिकोण में स्थित व्योम पंकजों से संयुत होवे । ५७-५८। उस पीठपर बटुक देव की पूजा करे और मूल मन्त्र के द्वारा ही मूर्त्ति की कल्पना कर लेनी चाहिए । फिर सद्योजात मन्त्र के द्वारा देव का आवाहन करे ।५६। मूलादि वामदेव के द्वारा परमेश्वर की स्थापना करनी चाहिए। इसके अनन्तर मूलमन्त्र से सान्निध्य करे ।६०। अघोरेण सुधीः कुर्यात्सन्निरोधमनन्तरम् । तुरुषाख्येन मनुना योनिमुद्रां प्रदर्शयेत् । ६१