भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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४३० ] [ श्रीशारदा तिलक ऊर्ध्वमुख्याः सुतानूर्ध्वमधोमुख्याः सुतानधः । इति सम्पूजयेन्मन्त्री पुत्रवर्गा स्त्रयोदशः ।६६ तद्वहिः पद्मपत्रेषु लोकेशवटुकान्यजेत् । ब्रह्माणपुत्रकं पूर्वे माहेशीपुत्रमैश्वरे ।७० पूर्व दिशा में ईशान पर्यन्त उनके बाहर इनका पूजन करना चाहिये-पूर्व में डाकिनी पुत्रों का-फिर डाकिनी पुत्रों का-पीछे लाकिनी पुत्रों का--इनके अनन्तर काकिनी के पुत्रों का, शाकिनी के पुत्रों का, फिर हाकिनी के पुत्रों का फिर मालिनी के पुत्रों का । इसके अनन्तर देवों के पुत्रों का--इसके उपरान्त उमा रुद्र मातृकायों के पुत्रों का दक्षिण की ओर यजन करना चाहिये ।६६-६८। ऊर्ध्व में मुख सुतो का ऊर्ध्व में और अधोमुख्य सुतों का अधोभाग में इस तरह से मन्त्रधारी को इन तेरह पुत्र वर्गों का अच्छी तरह से पूजन करना चाहिये ।६६। इनके बाहरी भागों में पद्म के पत्रों में लोकों के ईश वटुकों का यजन करना चाहिये । पूर्व दिशा में ब्राह्मणी पुत्र का अर्चन करे ओर ईश्वर की दिशा मे माहेशी के पुत्रों का अर्चन करना चाहिये ।७०। वैष्णवीपुत्रक सौम्ये कौमारीपुत्रमानिले । इन्द्राणीपुत्रकं भूयः पूजयेत्पश्चिमे तमः ।७१ महालक्ष्मीसुतं पश्चाद्रक्षोदिशि समर्चेयेत् । वाराहीपुत्रकं याम्ये चामुण्डासुतमानले ।७२ वटुकान्दशदिक्ष्वर्चेद्धेतुक त्रिपुरान्तकम् । बेताल वह्निजिह्वाख्यं कालान्ताख्य करालकम् ।७३ एकपादं भीम दंष्ट्रमचल हाटकेश्वरम् । दिग्वि दिक्ष्वन्तरालेषु श्रीकण्ठान्-जेत्पुनः ।७४ क्रोधीशवरादीनव्वृवन्तांस्तद्वद्बाह्ये समर्चेयेत् । ततस्त्रीन्नकुलीशाद्यान्दक्षिणे पूजयेत्सुधीः ।७५