शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 435, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टादश पटल ] [ ४३५ आहरण करना चाहिये ।६४-६५। बुध पुरुषों के द्वारा दो प्रकार का बलि बताया है। एक सात्विक होता है और दूसरा राजस बलि हुआ करता है। जो राजस बलि होता है वह रक्त-माँस से अन्वित होता है और तीन फलों से युक्त होता है ।६७। मुद्गपायससंयुक्त्तो मधुरत्रयलोलितः । सात्विको मांंसरहितः शेषमन्यत्पुरोक्तवत् ।६८ ब्राह्मणो विनयः शुद्धः सात्विकं बलिमाहरेत् । साधयन्मनुनाने भस्म सर्वार्थसिद्धिदम् ।६६ उशीर चन्दनं कोष्ठ घनसारं सकुंकुमम् । श्वेताकंमूलं वाराहीं लक्ष्मी क्षीरमहीरुहाम् ।१०० त्वचो बिल्वत्तरोर्मूलं शोषयित्वा सुचूर्णयेत् । चूर्णं व्योम्नि गृहीतेन गोमयेन विमिश्रिम् ।१०१ कृत्वा पिण्डानि संशोष्य संस्कृते हव्यवाहने । मूलेन दग्ध्वा तद्भस्म शुद्धपात्रे वनिःक्षिपेत् ।१०२ जो सात्विक बलि होता है वह मूंग व पायस से संयुक्त और मधुर त्रय में लोलित होता है। सात्विक बलि माँस से रहित होता है और शेष सब पूर्व में कहे हुये ही की भांति हुआ करता है ।६८। विनय से युक्त और शुद्ध ब्राह्मण सात्विक बलि का ही आहरण करे । इस मन्त्र के द्वारा साधन करते हुआ जो भस्म होती है वह सब अर्थ और सिद्धि से प्रदान करने वाली हुआ करती है ।६६। अब भस्म के साधन का प्रकार बताया जाता है, शरीर, चन्दन, कुष्ठ, कपूर, कुंकुम, श्वेत आक का मूल, बाराही, लक्ष्मी, और दूध वाले वृक्षोंकी त्वचा (वल्कल) विल्व वृक्ष की जड़-इस सबको सुखाकर कूट-पीस कर चूर्ण बना लेवे । चूर्ण को व्योम गृहीत कर गोमय से विमिश्रित करे ।१००-१०१। उसके पिण्ड बनाकर सुखावे तथा संस्कार की हुई अग्नि में मूल-मन्त्र से जला कर उस भस्म को शुद्ध पात्र में विनिक्षिप्त कर देवे ।।१०२।