भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 436

४३६ ] [ श्रीशारदा तिलक केतकी मालती पुष्पैर्वासयेत् भस्म शोधितम् । अयुतं प्रजपेन्मन्त्रं स्पृष्ट्वा भस्म सुपुजितम् ।१०३ एतदादाय दिनशः प्रातः पुण्ड्रं करोति यः । तस्य रोगाः प्रणश्यन्ति कृत्यादोहमहाग्रहाः ।१०४ रिपुचौरमृगादिभ्यो भयमस्य न जायते । वर्द्धन्ते सम्पदः सर्वाः पूज्यते सकलैर्जनैः ।१०५ राजा वश्योमवेत्तस्य सामात्यः सपरिच्छदः । अभिषेकं प्रकुर्वीत राज्ञो विजयकांक्षिणः ।१०६ पूर्वोक्ते मण्डपे कॢप्ते वितानध्वजशोभिते । सर्वतोभद्रमालिख्य कर्णिकां तस्य पूरयेत् ।१०७ उस शोभित भस्म को केतकी और मालतीके पुष्पोंसे वासित करे । उस भली भाँति पूजित भस्म का स्पर्श करके दश सहस्र की संख्या में मन्त्र का जप करना चाहिये ।१०३। इसको ग्रहण करके दिन में जो पुरुष प्रातःकाल में पुण्ड्र (तिलक) करता है उस पुरुषके सब रोग और कृत्या द्रोह तथा महान ग्रह सभी नष्ट हो जाया करते हैं ।१०४। शत्रू- चोर और हिंसक पशु आदि से भी इस पुरुष को कभी भी भय नहीं हुआ करता है। इस पुरुष की सभी सम्पदायें बढा करती हैं और यह पुरुष सभी जनों के द्वारा पूजा जाया करता है ।१०५। उस पुरुष का राजा अपने अमात्यों के सहित और सम्पूर्ण परिच्छद के साथ वश्य हो जाया करता है। जो राजा विजय की आकाङ्क्षा रखता हो उस राजा का अभिषेक करना चाहिये ।१०६। पूर्व में वर्णित मंडप में जो कॢप्त किया गया है और वितान और ध्वजा पताओं से सुशोभित है इसमें सर्वतोभद्र का आलेखन करके उसकी कर्णिका को पूरित कर देना चाहिये ।१०७ अष्टद्रोणप्रमाणेन् शालिभिः शोभितैः शुभ्रैः । तदर्द्धन्तण्डुलांस्तस्मिन्न्यस्य दूर्वाक्षतान्विताम् ।१०८