शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 437, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टादश पटल ] [ ४३७ हेमादिविहितं कुम्भं नवरत्नसमन्वितम् । संस्थाप्य विपुलै स्तोयैरापूर्यास्मिन्वनिः क्षिपेत् ।१०६ क्षीरद्रुमग्रपल्लवानि लक्ष्मीदूर्वा सहां पुनः । कर्पूरं चन्दनं बिल्वमुशीरं कुंकुमं पुनः ।११० कङ्कोलमगुरुं जातिं मल्लिकां चम्पकोत्पले । गोमेदं दाडिमं पश्चात्पट्टयुग्मेन वेष्टयेत् ।१११ तस्मिन्नावाह्य वटुकं राजसं सम्प्रपूजयेत् । वहिरष्टसु कुम्भेषु भैरवानष्टपूजयेत् ।११२ आधे द्रोण के परिमाण से भ शोभित शालियों से जिसमें उनके आधे तंडुल रखे जो दूर्वा और अक्षतों से समन्वित होवे । एक कुम्भ सुवर्ण आदि धातुओ से निर्मित कराकर उसे नौ प्रकार के रत्नों से समन्वित करे । उस कुम्भ को संस्थापित करके बहुत अधिक जल से आपूरित करके उसमें डाल देवे । उसमें निःक्षिप्त की जाने वाली वस्तुयें ये हैं—दूध वाले वृक्षो के पल्लव, लक्ष्मी, दूर्वा, सहा, कपूर, चन्दन, विल्व, उशीर, कुंकुम, कंकोल,, अगुरु जाति, मल्लिका चम्पक, उत्पन्त, गोमेद, दाडिम, इन सबका प्रक्षेप करना चाहिये । फिरदो पट्टो से वेष्ठित कर देवे ।१०८-१११। उसमें राजस वटुक का आवाहन करके भली भाँति पूजन करे । बाहर में जो आठ पत्र है उनमें आठों भैरवों का अर्चन करना चाहिये ।११२। त्रयोदशसुकुम्भेषु त्रयोदश गणान्यजेत् । बाह्ये दशसुकुम्भेषु लोकेशानर्चयेत्सुधीः ।११३ तद्बहिर्द्व्यष्टकुम्भेषु श्रीकण्ठादीन्सुरेश्वरान् । पञ्चत्रिशत् घटेष्वर्चैत्कादिबर्णेश्वरान्क्रमात् ।११४ इति गन्धादिभिः सम्यक् पञ्चावरणमर्चयेत् । अयुतं प्रजपेत्पृष्ट् वा तान्घटान्देशिकोत्तमः ।११५ पायसैः सर्पिषा शुद्धैस्तिलै दशशतं पृथक् । जुहुयात्तन्घटन्स्पृष्ट् वा प्रत्यहं बलिमाहरेत् ।११६