भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 438

४३८ ] [ श्रीशारदा तिलक राजसोक्तप्रकारेण रात्रे देशिकसत्तमः । मुदिने शोभने लग्ने वाचयित्वा द्विजन्मभिः ।११६ स्वस्तिमङ्गलवाक्यानि विशुद्धैर्वेदपारगैः । नदत्सुपञ्चवाद्येषु प्रणम्य वटुकेश्वरम् ।१२० जितेन्द्रियं शुद्धकाय राजानं ब्राह्मणाप्रियम् । आस्तिकं सत्यवचनमभिषिञ्चेत्प्रसन्नधीः ।१२१ तेरह सुन्दर कुम्भों में तेरह गणों का अर्चन करे । बाह्य भाग में दश कुम्भों में सुधी पुरुष लोकेशों का पूजन करे ।१३३। उनके बाहिर आठ कुम्भों में श्रीकण्ठ आदि सुरेश्वरों का यजन करे । पैंतीस घंटों में क्रम से आदि वर्णों के ईश्वरों का अर्चन करना चाहिये ।११४। इन रीति से गन्ध आदि उपचारों के द्वारा अच्छी तरह से पञ्चावरण की पूजा करे । उत्तम आचार्य को चाहिये कि वह उन सब घटों का स्पर्श करके दश सहस्र मन्त्र का जप करे ।११५। पायस, घृत, शुद्ध तिल इनसे पृथक् उन घटों का स्पर्श करके दश शत होम करना चाहिये ओर प्रतिदिन बलि का आहरण करे ।११७-११८। राजस में कहे हुये प्रकार से आचार्यों में परम श्रेष्ठ रात्रि के समय में सुन्दर दिन में और शोभन लग्न में द्विजों के द्वारा स्वस्ति वाचन और पुण्याह वाचन आदि मङ्गल वाक्यों का वाचन करावे । किन्तु ब्राह्मण विशुद्ध और वेदों के पारगामी विद्वान् होने चाहिये । पाँचों प्रकार के वाद्यों के बजाये जाने पर वटु- केश्वर को प्रणाम करे । फिर जिसमें इन्द्रियों को जीत लिया हो ब्राह्मणों पर प्यार करने वाला हो--शुद्ध शरीर वाला हो ऐसे राजा का जो आस्तिक--सत्यवादी होवे उसका प्रसन्न बुद्धि वाला पुरुष अभिषेक करे । ११६-१२१। अभिषिक्तो नरपतिः प्रणिपत्य गुरुं परम् । भूयसीं दक्षिणां दद्यात्प्रसोदति यथा गुरुः ।१२२ राजाभिषषक्तो भवति साक्षाद्भूमिपुरन्दरः । परान्विजयते भूपान्स्तूयते सकल जनैः ।१२३