भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 439, कुल 511 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 439

अष्टादश पटल ] [ ४३६ कृत्वाभिषेकं षण्मासं प्रतिमासं महीपतिः । चतुरम्भोधिबलयां शास्ति सर्वां वसुन्धराम् ।१२४ गजाश्वशान्तिविधये तेष शालासु साधकः । कुण्ड कृत्वा विधानेन होमं कुर्याद्यथाविधि ।१२५ पायसाज्यतिलै विद्वानयुतत्रियावधि । ब्राह्मणान्भोजयेन्नित्यं भक्ष्यभोज्यफलादिभिः ।१२६ अभिषेक किया हुआ राजा परम गुरुको प्रणाम करके बहुत ज्यादा दक्षिणा देवे जिससे गुरुदेव प्रसन्न होवें।१२२। अभिषेक किया हुआ राजा साक्षात् भूति का इन्द्र हो जाता है। वह फिर दूसरे राजाओं पर विजय प्राप्त किया करता है और समस्त जनों के द्वारा स्तुत हुआ करता है ।१२३। राजा छः मास पर्यन्त प्रति मास में अभिषेक करके चार महा- सागरों के वलय वाली अर्थात् आसमुद्रान्त सम्पूर्ण वसुन्धरा पर शासन किया जाता है ।१२४। गजों, अश्वोंकी शान्ति की विधि के लिये साधक उनकी शालाओं में विधि-विधान से कुण्ड की रचना करके विधि के साथ होम करे ।१२५। विद्वान् पुरुष पायस-घृत और तिलों के द्वारा आयुतों की अवधि तक अर्थात् तीस हजार तक होम करे । नित्य ही भक्ष्य-भोज्य और फलादि के द्वारा ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिये ।१२६। प्राक् प्रोक्तविधिना कुम्भान्स्थापयित्वात्र देशिकाः । अभ्यर्च्य गन्धपुष्पाद्यैस्तज्जलैः प्रोक्षयेद्गजान् ।१२७ अश्वशालासनेनै, वर्द्धन्ते दिने दिने । युद्धेषु महती शक्तिर्जा ते पूर्वतोऽधिका ।१२८ सर्वेरोगाः प्रणश्यन्ति कृत्याद्रोहाः परैः कृताः । अस्मात्परतरा रक्षा नास्ति तेषा महीतले ।१२६ अभिषिच्य महीपालं परेषां विजयोद्यतम् । उक्तेन विधिना मन्त्री यामिन्यां बलिमाहरेत् ।१३० अन्य्यूनाङ्गमजं हत्वाराजसं प्रागुदाहृतम् । वलिप्रदानसमये रिपूणा सर्वसैन्यकम् ।१३१