शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 440, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें४४० ] [ श्रीशारदा तिलक निवेदयेद्वलित्वेन वटुकायः विशिष्टधीः । विदर्भयेच्छत्रुनाम्ना बलिमन्त्रं तथा सुधीः । १३२ आचार्य प्राक् प्रोक्त विधि से यहाँ पर कुम्भों की स्थापना करके उनके जल से गजों का प्रोक्षण करना चाहिये । १२७। इसी विधि से इसके ही द्वारा अश्वशाला का भी प्रोक्षण करेतो वे गज और अश्व दिन पर दिन वृद्धि को प्राप्त ही जाया करते हैं। पूर्वसे भी कहीं अधिक इनकी युद्धों में बड़ी भारी शक्ति हो जाया करती है । १२८। सभी रोगों का विनाश हो जाया करता है और कृत्या द्रोह जो अन्यों के द्वारा किये गये हैं उन सबका भी नाश हो जाता है । उनकी रक्षा इससे बड़ी कोई भी मही-तल में नहीं है । १२६। उनकी सुरक्षा का यही सर्वोत्तम साधन होता है । जो राजा अपने-अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिये समुद्यत है उस नरपति का अभिषेक करके मन्त्रधारी पूर्वमें वर्णित विधि से यामिनी में बलि का अपहरण करे । १३०। अन्यून अङ्गों वाले अजका हवन करके पहिले राजस कहा गया है। बलि के दान के समय में सम्पूर्ण सेना को वटुक के लिये बलि के रूप में विशिष्ट बुद्धि वाले को निवेदन करना चाहिये । १३१। तथा शत्रु के नाम से सुधी वाले मन्त्र को पढ़े और बलि का आहरण करे । १३२। शत्रु पक्षस्य रुधिर पिशितं च दिने दिने । भक्षयः स्वग्गणैः सार्द्धं सारमेय समन्वितः । बलिबन्त्रोऽयमाख्यातः शर्वषां विजयप्रदः । अनेन बलिना दृष्टा वटुकः परसैन्यकम् । १३१ सर्वं गणेभ्यो विभजीमामिषं क्रुद्रमानसः । एवं कृते परिकुलं क्षीयते नात्र संशयः । १३४ विजयश्रियमेतेन राजा प्राप्नोत्ययत्नतः । १३५ आये दिन शत्रु के पक्ष वालों के रुधिर और माँस को अपने गणोंके साथ तथा सारमेयों से समन्वित होकर भक्षण करो । इस प्रकार से अभिमंत्रित यह विधान रात्रिमें करे तो विजयके प्रदान करने वाला हुआ