शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 441, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टादश पटल ] [ ४४१ करता है। इस मन्त्र के द्वारा दिये हुए बलिसे भगवान् वटूक देव परम प्रसन्न होते हुये शत्रु की सेना के सैनिकों के मास को अपने समस्त गणों के लिये क्रुद्धमन वाले होकर विभक्त कर दिया करते हैं। ऐसा करने पर शत्रु का बल अवश्य ही क्षीण हो जाया करता है-इससे कुछ भी संशय नहीं है । १३४। इस प्रयोग के द्वारा राजा विजय प्राप्त करने की श्री को अवश्य ही प्राप्त कर लिया करता है अर्थात् राजा को विजय निश्चित रूप से हुआ करती है और उसके प्राप्त करने में कुछ भी अन्य यत्न नहीं करना पड़ता है अर्थात् कुछ भी उपायन करने पर भी विजय हो जाती है ।१३५। श्रोमायास्मरकूटमंत्रविलिखेन्मध्यं दलेष्वष्टसु द्विः-प्रोक्त वटुकाय शब्दमपान्मन्त्रस्य वर्णान्वहिः । 'अष्टद्वन्द्वदलेषु तद्वबहिरधस्तत्संख्यपत्रेष्वथ । द्वात्रिंशद्दलकादिशान्तसहितं यन्त्रं लिखेद् भूपुरे । १३६ आपदुद्धारणं यन्त्रमपमृत्युभयापहम् । सर्वसम्पत्प्रदं नित्यं सर्वसौभाग्यदायकम् । १३७ रक्षाकरं ग्रहार्तानां राज्ञां विजयवर्द्धनम् । आपदुद्धारणादस्मादापदुद्धारणक्षमः । १३८ अब यन्त्र विशेष बतलाया जाता है अर्थात् श्री बीज, माया-शक्ति का बीज, स्मर अर्थात् कामदेव—क्लीं, बीज, कूट-क्लीं, मध्य में अर्थात् कर्णिका में लिखना चाहिये। दो बार कहा हुआ वटु काय’— यह शब्द लिखे, आठ दलों में बाहर मन्त्र के दूसरे वर्णों को लिखना चाहिये। दो आठ दलों में उनके बाहिर और नीचे उतनी ही संख्या वाले पत्रों में लिखे। बत्तीस दलों के आदि वाले सान्त के सहित लिखे और भूपुर का लेखन करके मन्त्र की रचना करनी चाहिये ।१३६। यह मन्त्र आपदाओं का उद्धरण है अर्थात् आपदाओं से रक्षा करने वाला होता है और अपमृत्यु अर्थात् बुरी रीति से होने वाली मौत के भय को दूर भगा देने वाला होता है। यह मन्त्र नित्य ही सब प्रकार की सम्प-