भारतकोश
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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

अष्टादश पटल ] [ ४४१ करता है। इस मन्त्र के द्वारा दिये हुए बलिसे भगवान् वटूक देव परम प्रसन्न होते हुये शत्रु की सेना के सैनिकों के मास को अपने समस्त गणों के लिये क्रुद्धमन वाले होकर विभक्त कर दिया करते हैं। ऐसा करने पर शत्रु का बल अवश्य ही क्षीण हो जाया करता है-इससे कुछ भी संशय नहीं है । १३४। इस प्रयोग के द्वारा राजा विजय प्राप्त करने की श्री को अवश्य ही प्राप्त कर लिया करता है अर्थात् राजा को विजय निश्चित रूप से हुआ करती है और उसके प्राप्त करने में कुछ भी अन्य यत्न नहीं करना पड़ता है अर्थात् कुछ भी उपायन करने पर भी विजय हो जाती है ।१३५। श्रोमायास्मरकूटमंत्रविलिखेन्मध्यं दलेष्वष्टसु द्विः-प्रोक्त वटुकाय शब्दमपान्मन्त्रस्य वर्णान्वहिः । 'अष्टद्वन्द्वदलेषु तद्वबहिरधस्तत्संख्यपत्रेष्वथ । द्वात्रिंशद्दलकादिशान्तसहितं यन्त्रं लिखेद् भूपुरे । १३६ आपदुद्धारणं यन्त्रमपमृत्युभयापहम् । सर्वसम्पत्प्रदं नित्यं सर्वसौभाग्यदायकम् । १३७ रक्षाकरं ग्रहार्तानां राज्ञां विजयवर्द्धनम् । आपदुद्धारणादस्मादापदुद्धारणक्षमः । १३८ अब यन्त्र विशेष बतलाया जाता है अर्थात् श्री बीज, माया-शक्ति का बीज, स्मर अर्थात् कामदेव—क्लीं, बीज, कूट-क्लीं, मध्य में अर्थात् कर्णिका में लिखना चाहिये। दो बार कहा हुआ वटु काय’— यह शब्द लिखे, आठ दलों में बाहर मन्त्र के दूसरे वर्णों को लिखना चाहिये। दो आठ दलों में उनके बाहिर और नीचे उतनी ही संख्या वाले पत्रों में लिखे। बत्तीस दलों के आदि वाले सान्त के सहित लिखे और भूपुर का लेखन करके मन्त्र की रचना करनी चाहिये ।१३६। यह मन्त्र आपदाओं का उद्धरण है अर्थात् आपदाओं से रक्षा करने वाला होता है और अपमृत्यु अर्थात् बुरी रीति से होने वाली मौत के भय को दूर भगा देने वाला होता है। यह मन्त्र नित्य ही सब प्रकार की सम्प-

४४२ ] [ श्रीशारदा तिलक दाओं के प्रदान करने वाले हैं ओर सभी तरह के सौभाग्य का भी देने वाला होता है ।१३७। जो पुरुष ग्रहोंके द्वारा किये हुये उपद्रवों से आत्तं अर्थात् पीड़ित होते हैं उनकी रक्षा करने वाला होता है । यह यन्त्र राजाओं के लिये विजय के वर्द्धन करने वाला करता है । इस तरह से आपदाओं के उद्धारण करने के कारण वह मन्त्र आपदाओं को दूर करने में समर्थ हुआ करता है ।१३८। तन्त्रेषु नास्ति मन्त्रोऽन्य इत्याहुर्मन्त्रवेदिमः । अर्धीशोवह्लिशिखरोलान्तस्थो दान्त ईरितः ।१३६ फठन्तश्चण्डमन्त्रोऽयं त्रिवर्णात्मा समीर्रितः । अस्य त्रिको मुनिः प्रोक्तश्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम् ।१४० चण्डेशो देवता प्रोक्ता कुर्यादङ्गविधिं पुनः । हृदयं दीप्तफट् प्रोक्तं ज्वलफट् शिर ईरितम् ।१४१ शिखा ज्वालानालिनी फट् ज्ञेया, फट् कवचं मतम् । हनफट् नेत्रमाख्यातं मर्वज्वालिनि फट् परम् ।१४२ विन्यस्यैवं षडङ्गानि ततोदेवं विचिन्तयेत् ।१४३ मन्त्रों के ज्ञान रखने वाले विद्वान् यही कहा करते है कि तन्त्र शास्त्रों में इससे बड़ा अन्य कोई भी यन्त्र नहीं है और न इसको समा- नता रखने वाला कोई दूसरा मन्त्र है । अब खण्ड मन्त्र बताया जाता है, अर्धीश, ऊ, दान्त, घः, वह्निशिखर, ध्व, लान्तस्थ, दान्त कहा गया है । इसके अन्त से 'फट्'-यह शब्द होता है । यह मन्त्र तीन वर्णों के स्वरूप वाला कहा गया गया है । इस मन्त्र को ऋषि त्रिक कहा गया है और इसका छन्द अनुष्टुप् बताया गया है ।१३६-१४०। इस मन्त्र का देवता खण्डेश कहा गया है । फिर इसके अङ्गों की विधि को करना चाहिये । इसका हृदय दीप्त फट् कहा गया है और ज्वल फट् इसका शिर कहा गया है ।१४१। ज्वालामालिनी फट्-इसकी शिखा जाननी चाहिये और फट् यह इसका कवच बताया है । हस फट्-यह नेत्र कहा है और सर्व ज्वालिनि फट् परम है ।१४२। इस रीतिसे इसके

अष्टादश पटल ] [ ४४३ षट् अङ्गों का विन्यास करके इसके पश्चात् निम्न प्रकार से देव का चिन्तन करना चाहिये ।१४३। चण्डेश्वरं रक्ततनुं त्रिनेत्रं रक्तांशुकाढ्यं हृदि भावयाम् । टङ्कं त्रिशूलं स्फटिकाक्षमालां कमण्डलुं बिभ्रतमिन्दुचण्डम् ।१४४ वर्णलक्षं जपेन्मन्त्रं होमं कुर्याद्दशांशतः । मधुरत्रयसंयुक्तैर्विशुद्धैस्तिलतण्डुलैः ।१४५ पञ्चाक्षरोदिते पीठे चण्डेशं साधु पूजयेत् । मूर्त्तौ बीजेनं कॢप्तायः तत्क्रमो बिन्दुसंयुतः ।१४६ चण्डेश्वराय हृद्बीलपूर्वः पूजामनुर्मतः । अङ्गैर्मातृभि राशैश्शंङ्खाद्यै राय्धैर्यजेत् ।१४७ चतुरावरणं प्रोक्तं चण्डेशस्य समर्चनम् । इति सिद्धे मनौ मन्त्री धनवाञ्जायतेऽचिरात् ।१४८ अब ध्यान करने का प्रकार बतलाया जाता है-रक्त वर्ण के शरीर को धारण करने वाले-तीन नेत्रों से समन्वित-रक्त वर्ण वस्त्रों से आढ्य टङ्क--त्रिशूल--स्फटिकों की अक्ष माला-- कमण्डल और चन्द्र के खण्ड को धारण करने वाले खण्डेश्वर को हृदय में भी भावना करता हूँ । अर्थात् अपने हृदय में ध्यान किया करता है ।१४४। इस मन्त्र में जितने भी वर्ण है उतने ही लाख इस मन्त्र का जाप करना चाहिये और जो भी जप किया जावे उसके दशम भाग का मन्त्र के ही द्वारा होम करना चाहिये । हवन तीनों प्रकार के मधुरों से संयुक्त तिलों तथा तण्डुलों के द्वारा करे ।१४५। पाँच अक्षरों से उदित पीठ पर खन्डेश का भली-भाँति अर्चन करना चाहिए । बीज के द्वारा कॢप्त सूत्ति में उसका विन्दु से संयुक्त कूर्म है ।१४६। खण्डेश्वरके लिये हृद् बीज पूर्व में रहने वाला इसकी पूजा का मन्त्र माना गया है । अङ्गों से मातृकाओं के द्वारा वज्र आदि आयुधों से युक्त दिक्पालों का यजन करना चाहिए ।१४७। खन्डेश का समर्थन चार आवरणों से समन्वित कहा गया है । इस रीति से मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर मन्त्र

४४४ ] [ श्रीशारदा तिलक के धारण करने वाले पुरुष थोड़े ही समय में धनवान् हो जाया करता है ।१४८। तर्पयेन्मनुनानेन नित्यमष्टोत्तरं शतम् । श्रियमाप्नोति महतीं पुत्रमित्रसमन्वितः ॥१४६ प्रियङ्गकुसुमैः फुल्लोस्तत्काष्ठोज्वलितेऽनले । जुहुयादयुतं मन्त्री पुरक्षोभः प्रजायते ॥१५० साध्यवृक्षत्वचो लोण पिष्ट्वा पिष्टसमन्वितम् । पुत्तलीं रुचिरां कृत्वा प्रतिष्ठाय समीरणम् ॥१५१ इसी मन्त्र के द्वारा मन्त्रधारी पुरुष को चाहिये कि नित्य ही देव का तर्पण किया करे । ओर एक सौ आठ बार तर्पण अवश्य ही करना चाहिये । इस तर्पण का यह प्रभाव होता है कि वह तर्पण करने वाला व्यक्ति अपने पुत्रों और मित्र मण्डलीके सहित बहुत बड़ी श्री की प्राप्ति का लाभ लिया करता है ।४६। मन्त्र के धारण करने वाले पुरुष को प्रियङ्ग के काष्ठों के द्वारा प्रज्वलित किये हुये अग्निमें खिले हुये प्रियङ्ग के पुष्पों के द्वारा दश सहस्र बार हवन करना चाहिये । इससे पुरक्षोभ हो जाता है ।१५०। साध्य वृक्ष की त्वचा अर्थात् उसका वल्कल और लोण इन दोनों को पीसकर पिष्ट से समन्वित करे । इसके द्वारा एक पुतली की रचना करनी चाहिये । यह पुतली परम सुन्दर बनानी चाहिये । इसकी रचना करके फिर उसमें शास्त्र की विधि के अनुसार प्राणों की प्रतिष्ठा करनी चाहिये १५१। छित्त्वा छित्त्वा प्रजुहुयादष्टोत्तरशतं निशि । सप्ताहमेवं कुर्वीत साध्यो दासो भवेत्तस्यम् ॥१५२ शैवमन्त्रेषु निष्णातश्चण्डेश्वरमनुं भजेत् । सर्वान्कामानवाप्नोति परत्रेह च नन्दति ॥१५३ धरापोऽग्निमरुद्व्यो ममखेशेन्द्वर्कमूर्त ये । सर्वभूतान्तरस्थाय शङ्कराय नमोनमः ॥१५४

अष्टादश पटल ] [ ४४५ श्रुत्यन्तकृतवासाय श्रुतये श्रुतिजन्मने । अतीन्द्रियाय महसे शाश्वताय नमोनमः ॥१५५ इस पुत्तलिका का छेदन कर-करके रात्रि के समय में एक सौ आठ बार प्रज्वलित अग्नि में आहुतियाँ देवे । इसी रीति से बराबर सात दिन तक किया करे तो वह साध्य ही आकर दास हो जाया करता है ।१५२। जो पुरुष भगवान् शिव से सम्बन्धित मन्त्रों के ज्ञान में परम निपुणात हो उसको ही चण्डेश्वरके मन्त्र का सेवन करना चाहिये । यह मनुष्य मन्त्र के सेवन करने से सभी मनोवाञ्छित कामनाओं को प्राप्ति कर लिया करता है । यह इस लोक में तो परम सुख सम्पन्न होता ही है ओर परलोक में पहुँचकर परमानन्द का सुख भोगा करता है ।१५३। धरा (भूमि), आपः, जल, अग्नि, मरुत, व्योम ( आकाश ) मखेश, इन्दु और अर्क, सूर्य की मूर्त्ति वाले तथा समस्त भूतोंके अन्तर में स्थित शंकर भगवान् के लिये वारम्वार नमस्कार है ।१५४। शैव मन्त्रों के अन्त में सर्वत्र भगवान् शिव का स्तवन होता है । मखेश का अर्थ यजमान होता है । श्रुति के अन्त में किए हुये वास वाले, भूतिस्वरूप, श्रुति के जन्म वाले इन्द्रियों की पहुँच से परे—शाश्वत अर्थात् तेज स्वरूपके लिए बारम्बार नमस्कार है ।१५५। स्थलसूक्ष्मविभागाभ्यामनिर्देश्याय शम्भवे । भवाय भवसम्भूतदुःखहन्ते नमोऽस्तुते ॥१५६ तर्कमार्गातिदूराय तपसः फलदायिने । चतुर्वर्गवदान्याय सर्वज्ञाय नमोनमः ॥१५७ आविमध्यान्तशून्याय निरस्ताशेषभीतये । योगिध्येयाय महते निर्गुणाय नमोनमः ॥१५८ { विश्वात्मनेऽविचिन्त्याय विलसच्चन्द्रमौलये । कन्दर्पदर्पकालाय कायहन्ते नमोनमः ॥१५९

४४६ ] [ श्रीशारदा तिलक स्थूल और सूक्ष्म के विभागों से निर्देशन करने के योग्य - सांसारिक सम्भूत दुःखों को पूर्ण रूप से हनन करने वाले अर्थात् संसार में होने वाले सभी प्रकार के दुःखों को विनाश कर देने वाले भव शम्भु के लिए नमस्कार है ।१५६। वे तर्कों के मार्ग में अत्यन्त दूर देश वाले अर्थात् ऐसे स्वरूप वाले हैं जहाँ तर्कों की सर्वथा पहुँच ही नहीं होती है। सभी प्रकार की तपश्चर्याओं के सुफलों को प्रदान करने वाले - धर्म—अर्थ—काम—मोक्ष इन चारों वर्गों के फलों को देने में वदान्य अर्थात् महान् दानी और सभी कुछ के ज्ञान रखने वाले शिव के लिए बारम्बार नमस्कार है ।१५७। जिनका न तो कोई आदिकाल है और न कोई भी मध्यकाल है तथा न कोई अन्त काल ही होता है वे आदि— मध्य और अन्त से रहित हैं। सभी तरह की भीतियों को निरस्त कर देने वाले हैं अर्थात् उनके भजन करने वाले भक्तजनों को किसी भी प्रकार का भय नहीं हुआ करता है क्योंकि उनके उपास्य देव के सामने कैसा भी भय नहीं टिकता है। जो योगाभ्यास करने वाले योगियों का परम ध्येय है अर्थात् योगीजन अपने ध्यान में समाधिस्थ होकर भगवान् शिव का ही निरन्तर ध्यान किया करते हैं। वे भगवान् शम्भु सबसे महान् हैं अतएव उनका नाम महादेव कहा जाता है । वे त्रिगुणों से रहित हैं। संसार की वस्तुयें और प्राणीगण त्रिगुणों से समन्वित रहा करते हैं और देवगण भी सत्व, रज, तम इन तीन गुणों के चक्रसे शून्य नहीं हैं। किन्तु भगवान् शम्भु इन गुणों से रहित और निर्गुण हैं, ऐसे भगवान् शिव के लिये बारम्बार प्रणाम ।१५८। यह प्रभु विश्व की आत्मा है अर्थात् सम्पूर्ण विश्व इनका ही स्वरूप है । चिन्तन करने के योग्य नहीं है अर्थात् इनका स्वरूप किसी के भी चिन्तन में नहीं आ सकता विराजमान है और इनका मस्तक उस इन्द्र के विद्यमान रहने में चन्द्र विराजमान हैं। कन्दर्प (कामदेव) के दर्प को लिए काल स्वरूप हैं। परम शोभित हैं। कन्दर्प (कामदेव) के दर्प को लिये काल स्वरूप है । कामदेव को सबको वश में कर लेने का बड़ा भारी अभिमान था और

अष्टादश पटल ] | ४४७ उसने योगीराज परम महान् शिव को भी अपने चक्र में फाँस लेने का कुचक्र अज्ञानवश चलाया था। किन्तु शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोल- कर उस काम को भस्म कर दिया था। उसकी पत्नी रति की अनुनय- विनय पर जीवित किया किन्तु उसे अङ्ग रहित ही जीवदान दिया था इसी से काम का नाम अनङ्ग है। काल सबका ही हनन करने वाला है देव-दानव-मानव सभी कालके ग्रास एक न एक दिन हो जाया करते हैं इसके प्रभाव से कोई भी अछूता नहीं रहा करता है, किन्तु भगवान् शिव उस काल का भी हनन कर देने वाले हैं और काल उनसे भयभीत रहा करता है। उन शम्भु के लिए बारम्बार प्रणाम है। १०६। विषाशनाय विहरद्वृषस्कन्धमुपेयुषे। सरितामसमाबद्धकपर्दति नमोनमः।१६० शुद्धायशुद्धभावाय शुद्धानामन्तरात्मने। पुरान्तकाय पूर्णाय पुण्यनाम्ने नमोरमः।१६१ भक्तानां निजभक्तानां भुक्तिमुक्तिप्रदायिने। विवाससे विवासाय विश्वेशाय नमोनमः।१६२ त्रिमूर्तिमूलभूताय त्रिनेत्राय नमोनमः। त्रिधाम्नां धामरूपाय जन्मघ्नाय नमोनमः।१६३ देवासुरशिरोरत्नकिरणारुणिताङ्घ्रये। कान्ताया निजकान्तार्थे दत्तार्द्धाय नमोनमः।१६४ स्तोत्रेणानेन पूजायां प्रीणयेज्जगतः पतिम्। भुक्तिमुक्तिप्रदं भक्त्या सर्वज्ञं परमेश्वरम्।१६५ भगवान् शम्भु विष के अशन कर देने वाले हैं। समुद्र के मन्थन करने पर कालकूट विष भी उसमें निकला था। सभी उस महा विष को देखकर भयभीत हो गये और सबने भगवान् शिव से प्रार्थना की तो इन्होंने सबको अभयदान देकर उस कालकूट विष का पान करके अपने कण्ठ में धारण कर लिया था। इससे विष को आश्रय

४४८ ] [ श्रीशारदा तिलक प्राप्त हुआ और उसका भय दूर हो गया था । तभी से शिव का शुभ नाम नीलकण्ठ हुआ है इक भगवान् का वाहन वृष है । ये सदा वृष के कन्धे पर समारूढ़ होकर ही विहार किया करते हैं । सरित के दाम से समावद्ध कपर्दीके लिए बारम्बार प्रणाम है । १६०। भगवान शिव का स्वरूप परम शुद्ध है । स्वरूप ही केवल नहीं आपके भाव भी परम शुद्ध हैं आप बहुत ही स्वल्प अर्चना और स्तुति से प्रसन्न हो जाते हैं अतएव इनका आशुतोष नाम है । इनकी अर्चना भी मँहगी नहीं होती है धतूरा, आक के पुष्प और जल से आप प्रसन्न हो जाया करते हैं । जो भी शुद्ध अन्तःकरण वाले है उन भक्तों की ये अन्तरात्मा है । त्रिपुर दैत्य के वध करने वाले पूर्ण और पुण्य नाम वाले भगवान शम्भु के लिये बारम्बार प्रणाम समर्पित है ।१६१। जो भी भक्ति करने वाले में और अपने भक्त हैं उनको सांसारिक सुखों का उपभोग और सांसारिक आवागमन के वन्धन से मोक्ष प्रदान करने वाले हैं । आप विवासा अर्थात् दिगम्बर हैं और आपका निवास भी कहीं नहीं है तथा विश्व के ईश हैं, उनको बारम्बार प्रणामहैं । तीनों (ब्रह्मा विष्णु महेश) मूर्त्तियों के आप मूलभूत हैं-तीन नेत्रों वाले हैं-इनको बारम्बार नम- स्कार है । तीनों धामों के धाम रूप जन्मों के विनाशक को बारम्बार प्रणाम है । देवों और असुरों के शिरो के रत्नों की किरणों से अरु- णित चरणों वाले-अपनी कान्ता के लिए कान्त-अर्ध भाग देने वाले को बारम्बार प्रणाम हैं। इस स्तोत्र के द्वारा जगतों के स्वामी को भक्ति से प्रीणित करे, जो भक्ति और मुक्ति के दाता सर्वत्र और परमेश्वर हैं ।१६५।

एकोनविंश पटल ] ६ ४४६

एकोनविंश पटल

॥ यन्त्र प्रकरण ॥

अथ वक्ष्यामि यन्त्राणां भेदांस्तन्त्रेषु गोपितान् । ये साधयन्ति सततं मन्त्रिणोनिजवाञ्छितम् ॥१ मार्णं लिखेत् सार्णयुतं स्वसाध्य वर्गाढ्यपत्रे स्वरकेसराब्जे । बहिः सदीर्घेर्गगनैः प्रवीतं रक्षाकरं यन्त्रमिदं प्रशस्तम् ॥२ पुटीकृते भूमिपुरस्य युग्मे मायां लिखेत् तन्मध्यगसाध्ययुक्ताम् । वकारकोणेन महीपुरेण संवेष्टितं वश्यकरं तदुच्चैः ॥३ मध्ये सार्णविभित प्रपुटित मृत्युञ्जयत्र्यक्षरैः । क्षान्तस्थं निजसाध्यनाम विलिखेत् किञ्जल्कसंस्थान् स्वरान् पत्रेष्वष्टसु नाममन्त्रपुटितं वर्गास्तदग्रेष्वथो । यन्त्रं पद्मपुटीकृतं निगदित मृत्युञ्जयाख्यं परम् ॥४ विषज्वरशिरोरोगनाशनं श्रीजयप्रदम् । कान्तिपुष्टिप्रदं वश्यं सर्व कामार्थसाधकम् ॥५ साध्याढ्यचिन्तामणिमग्निगेहे विलिख्य बाह्यंऽनलगेहवीतम् प्रवेष्टयेत् तद्बहिराष्टवर्णमन्त्रेण यन्त्रं ज्वरशान्तिदं स्यात् ॥६ संप्लवसः प्लावयसोयन्त्रोऽष्टाक्षर ईरितः । एष एव भवेद्दक्षो ग्रहज्वरविनाशने ॥७ इनके अनन्तर अब तन्त्रों में पोषित यन्त्रों के भेदों को बतलाते हैं जो सदा ही मन्त्रधारियों के अपने अभीष्ट को साधित किया करते हैं । कर्णिका में स्थित मकार के मध्य में सकार से युक्त अर्थात् बिन्दु के सहित 'स' वर्ग में संयुत अपने साध्य की अर्थात् फल वाचक पद को लिखना चाहिये । कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग—ऊष्मा संज्ञक शषसह और यरलव अन्तस्थ वर्गोंसे युक्त जिसमें दल हों और दो-दो के क्रम से केसरों में जिके स्थर हों तथा बाहर दीर्घ के सहित गगनों से प्रतीत हो ऐसा यन्त्र ही परम श्रेष्ठ रक्षा के करने वाला होता।

४५० ] [ श्रीशारदा तिलक है ।१-२। यहाँ पर मातृका देवता है उसकी पूजा करके प्राण प्रतिष्ठापन करे और फिर उसे धारण करना चाहिए । भूपुर के युग्म के पुटीकरण में मध्यम साध्य से संयुत माया को लिखे । यहाँ सर्वत्र यन्त्रमें साधारण प्रक्रिया बतलाई गई है । वहाँ पर षट् कर्म—मारण, मोहन, वशीकरण स्तम्भन, आकर्षण, उच्चाटन इनमें यन्त्र में लिखना आवश्यक है । अब मृत्युञ्जय मन्त्र बतलाया जाता है । मध्य में आठ दल वाली कर्णिका दो निम्नलिखित विशेषणों से युक्त क्षकार के मध्यममें साध्य में का नाम लिखे । साध्य कर्मके लिखने का प्रकार यह है—'क' आदिक को पद्मके आगे के भागों में लिखना चाहिये । जिसके कोण में वकार हो ऐसे भूपुर में संवेष्टित बहुत ऊँचा वश्य करने वाला होता है ।३। अब मृत्युञ्जय नाम वाले यन्त्र को बतलाते हुए कहते है क्षान्त में अपने साध्य का नाम लिखना चाहिए और पद्म के आठ दलों के नामसे सम्पुटित वर्णों को लिखे । इसके अनन्तर उनके आगे पद्म से सम्पुटित यन्त्र को लिखे यह मृत्युञ्जय नामक परमयन्त्र होताहैं । यह यन्त्र विष की वेदना ज्वर शिर के रोगों का विनाश करने वाला होता है तथा श्री और जय के प्रदान करने वाला है । कान्ति एवं पुष्टि का प्रदाता—वशीकरण कारक और सभी कामों के अर्थ का साधक होता है ।४-५। अग्नि ग्रह में चिन्तामणि (शैव) साध्य से युक्त लिखकर वाह्य में अनल गेह से युक्त मन्त्र लिखे —यह यन्त्र ज्वर का शमन करने वाला होता है । सप्लवस प्लावयस यन्त्र आठ अक्षरों वाला बताया गया है । यही यन्त्र ग्रह बाधा से संयुत ज्वर का विनाश करने में दक्ष होता है ।६-७। तारठद्वयपुट कुरुकुल्ले मन्त्रमन्त्रहुतभुक् गृहयुग्मे । मध्यकोणविरेषु लिखेत् तन् मन्त्रमाशु विनिहन्ति भुजङ्गान् ओं कारमायादिकमेखलेऽग्निवभूमन्नु' वह्निगृहस्य युग्मे । मध्यादिकोणेषु विलिख्य भूर्ज यन्त्रं विदध्याद्रिपुनागसारि ।६

एकोनविंश पटल ] ४५१ शूलाङ्किते वह्निगृहस्य युग्मे धूमावती उल्लिखेत् क्रमेण । मध्याग्निकोणेषु मरुद्गृहस्थं यन्त्रं हुताशनिलवर्णयेतम् ॥ १० दान्तौ सार्धीश बिन्दुन्तो बोजे धूमावती द्विठः । धूमावती मनुः प्रोक्तः शत्रुर्निग्रहकारकः १११ विषेण कनकाम्भोभिः प्रेतकपटकल्पितम् । श्मशाने लिखनेदेतत् शत्रू नुच्चाटयेद्द्भ्रुतम् ।।२ हुताशगेहद्वितये लिखित्वा वैवस्वताय द्वित्ववर्णमन्त्रम् । मध्याम्तमाकल्पितमिन्दुबिम्बे यन्त्र महाभूतपिशाचवैरि । १३ नामा लिख्य मकारकोष्ठयुगजे कोणेषु तस्या यन्त्रगान् । मन्त्रज्ञो ङञणान्कारसहितान् धूमावतो यन्त्रवान् । वीतं घुंघुटिकादिना परमिदं वायुत्रिगेहावृतम् । यन्त्रं प्रान्तपरेतभूमिनिहितं विद्वेषण स्याद्विषाम् ॥१४ दो तारोंसे सम्पुटित यन्त्र अर्थात् आदि में तार और अन्तमें स्वाहा कुरु कुल्ले मध्य में लिखे — यही इसका स्वरूप है इससे यह सात अक्षरों वाला होता है। अग्नि के दोनों गृहों में मन्त्र कोण-विरों में लिखे तो वह मन्त्र अति शीघ्र हीं भुजङ्गों का निहनन करने वाला होता है। यहाँ पर 'कुरु कुल्ल' देवता है ।८। अब अन्य सर्पों का हनन करने वाला यन्त्र बतलाया जाता है। यह सात अक्षरों वाला मन्त्र है। मेखला मे इसका स्वरूप यह है कि आदि में ॐकार होता है विह्न गृह के युग्म में अग्नि वधू मन्त्र को मध्यादि कोणोंमें भोज पत्र पर लिखकर यन्त्र को बनावे । यह यन्त्र रिपु और नागों का हरण करने वाला होता है ।६। विह्न गृह के शूलांकित युग्म में क्रम से धूमावती मन्त्र को लिखना चाहिए । मध्याग्नि कोणों में मरुद गृह में स्थित मन्त्र को जो हुताश और अनिल वर्ण से संयुत हो, दीर्घकार जो विन्दु से युक्त हों अर्थात् धूं-धूं हों—ये बीज हैं। हुताश रेफ का नाम है। यह आठ अक्षरों का मन्त्र है, दो 'ठ' हैं। यह धूमावती का मन्त्र है जो शत्रुओं के निग्रह करदे वाला होता है। १०-११। किसी विष जल से तथा धतूरे के रस से प्रिय के वस्त्र पर

४५२ ] [ श्रीशारदा तिलक अर्थात् कफन पर श्मशान में लिखे तो यह शत्रु का एक बहुत ही अद्भुत उच्चाटन करने वाला होता है ॥१२॥ यह सात अक्षरों का मन्त्र होता है। दो बार 'ठ' लिखकर अन्तमें स्वाहा लिखना चाहिये। मध्यमें षट्कोणों में सात वर्णों को लिखे। यहाँ यम देवता है ॥१३॥ यह मन्त्र महाभूत और पिशाचों का नाशक है। अब षट्कर्णों में एक विद्वेषण कर्म भी होता है। उसके लिये मकार कोष्ठ युगल में कोणों में साध्य साधक कर्म रूप नाम लिखे। एक स्थान में साध्य का नाम और दूसरे स्थान में साधक का नाम लिखना चाहिये। मन्त्रज्ञ-इससे ड़णाञ्प को संमण्डत्व कहा गया है। आठ दलों वाला कमल लिखकर उसकी कर्णिकामें मकार लिये और उसके दलों में धूमावती के अक्षरों को लिखे। उसके ऊपर घुं-धुं आदि की आवृत्ति करे। बाहर ओर वायुगृह लिखे। जिन द्वेषियो का विद्वेषण करना हो उनका अमुक-अमुक साध्य नाम लिखे फिर प्रान्त में परेत भूमि में उसको विहित कर देवे तो निश्चित रूपसे विद्वे- षण होता है। पूर्व में घुर्तुं युग्म ओर फिर मर्क्कटिक युग्म घोर विद्वेष करने वाली और विद्वेषी के उद्वेग करने वाली है ॥१४॥ पूर्वं घुर्घु टिके युग्मं ततोमर्कटिक यु गम् । घोरे विद्वेषकारिणि विद्वेषोद्वेगकारिणि । १५ अथ घोराघोरयोः स्यादमुकासुकयोस्ततः । विद्वेषयद्वयं हुं फट् विद्या घुर्घु टिकेरिता । १६ प्राक्प्रत्यग् दक्षिणोदग्विधिवदभिलिखेत् स्पष्टरेखाचतुष्कम् । कोणोद्यच्छूलयुक्तं वलययुगयुतं मध्यपूर्वं तदन्त्यम् । मन्त्रस्यार्णान् परस्तात् वसुपदविवरेष्वष्टवर्णांल्लिखित्वा । शूलोद्यत् द्वादशार्णं विधिवदभिहितं प्रेतराजस्य यन्त्रम्। १७ यमराजसदौमेययमेदोरुणयोदय । यदि योनिरपक्षेय चक्रिरामय । उक्तो धूमान्धकाराय स्वाहेत्यष्टाक्षरोमनुः ॥१८

एकोनविंश पटल ] [ ४५३ प्रणवः श्री ततोदंष्ट्रा तत्परं विकृत ततः । क्षानताय वधूवह्निर्मन्त्रोऽयं द्वादशाक्षरः । १६ इसके अनन्तर अमुक-अमुक का घोर-अघोर का जो विद्वेष द्वय है वह घुर्घु टिकके द्वारा ईरित हुँ-फिट् विद्याकही गयी है। इसके अनन्तर मारण यन्त्र बतलाते हैं-उसकी विधि यह है-आदि में दोनों पाश्वों में महिषक चशिरों को लिखकर उसके मध्य में यन्त्र का समान करे । बाहर अष्टगुण वस्त्रमें विधि से उस मन्त्रको लिखना चाहिये । त्रिवर्तुल का लेखन करके मध्य में दक्षिणोत्तर रूप से दो रेखायें लिखकर और पूर्व पश्चिम रूप से दी रेखायें लिखे । आग्नेल आदि कोणोंमें चार रेखायें लिखित करके दिशाओं स्थित रेखाओं के अग्रभागों में आठ शूलों को कोण रेखा के अग्र भागों में (यही शूलों का चतुष्टय है) लिखकर- वहाँ शास्त्र में कथित प्रकार से मन्त्र के अक्षरों को लिखना चाहिए । वसुपद विकरों में आठ वर्णों को लिखकर पीछे मन्त्र के वर्णों को लिखे । यह प्रेतराज का मन्त्र होता है, जिसको विधिवत् बतला दिया गया है, शूलोद्यत् बारह वर्णों का है । १५-१७। घृमान्धकान्तय स्वाहा-यह आठ वर्णों का मन्त्र है । प्रार्थना यह है-यमराज सदोमेय गये दोरुणयोदय, यदि योनि अपक्षेय ओर निरामय । १८। कुछ मनीषी प्रथम मायष्टी पूर्व विकृत तनं हुँ फट् स्वाहा-ऐसा मन्त्र कहते हैं-यह द्वादश अक्षरों का मन्त्र होता है । १६। विषवृक्षस्य भलके नृचर्मणि पटेऽथवा । आलिख्याष्टविषैरेतत् श्मशाने निखनेत्तन्निशि । २० ज्वरण महता विष्टा मूर्छाकुलितमानसः । रिपुर्गच्छति पक्षेण यमलोकं न संशयः । २१ एकाशीतिपदेषु मध्यदहने साध्यं लिखेदुधुं पुनः । क्षभ्रू ब्लूमिति दिग्गतासु विलिखेत् बीजानि पंक्तिष्वथ । शिष्टेष्वीशनिशाचरादि विलिखेत् कालोमनुं पंक्तिश- स्तद्बांहे यमवातमग्निपवनाऽऽव्रीतच यन्त्र लिखेत् । २२

४५४ ] [ श्रीशारदा तिलक काली माररमाली कलीनमोक्षक्षमोनलीं । मामो देततदे मामा रक्ष तत्वत्वक्षरः । २३ काली मन्तूयं प्रोक्तः कालरात्रिश्च (स्व) वैरिणाम् । यमामाटटमामाय माटमोटटमोटमा । २४ वामो भूरिरिभूमो वा टटरीत्वत्व स्वस्वं) रीटृ । यमात्मकोयमाख्यातः श्लोको वैपिविनाशनः । २५ लिखेद्गुविषारानिम्बनिर्यासिकज्जैलैः । निग्रहाख्यमिदं यन्त्रं काकपक्षण कप्पटे । २६ विभोतवृक्षे वल्मीके श्मशाने वा चतुष्पथे । दक्षिणस्थेऽनिले मन्त्री निखनेदद्धंरात्रके । २७ सर्वथा शत्रुरेतेन सप्ताहान्मरणं ब्रजेत् । निगृह्यते महारोगैः पतितो वा भवेदसौ । २८ मारण मन्त्र बताया जाता है-इस मन्त्र को विष वृक्ष के तख्ते पर या मानव के चमड़े पर अथवा पट पर आठों प्रकारके विषोसे लिये और इसकी रात्रि में श्मशान मे गाड़ देवे । इसका परिणाम यह होगा कि शत्रु भयानक ज्वर से आविष्ट होकर मूच्छित-साहो जायगा तथा वेचनी से व्याकुल मन वाला हो जायगा फिर यह शत्रु एक पक्ष में निस्सन्देह यमलोक में चला जाता है । इक्यासी पदों में मध्य दहन में साध्य को लिखे और इसके अनन्तर फिर-वम लिखना तथा क्षभ्र ब्लूम इसको दिग्गतों में लिखे और इसके अनन्तर पत्तियों से बीजों को लिखना चाहिये । शिष्टों में ईश निशाचर आदि काली के मन्त्र को यक्तियों में लिखे । मध्य दहन का अर्थ है मध्य कोष्ठ रेफ । उसके बाहिर ईशाना दिनैऋर्त्तान्त को एकबार लिखकर फिर नैऋर्तादि ईशान्यन्त लिखना चाहिये । इस विधि से मन्त्र का लेखन करे । मन्त्र यह है-'काली भार- रमाली कालीन मोक्ष क्षमो नली । मामो देत तदे मामा रक्ष तत्वक्षरं ।२०-२३। यह काली का मन्त्रा कहा गया है और यह अपने शत्रुओं के लिए कोल रात्रि होता है । मन्त्रा यह है-'यमामाट टमामाय माट

एकोनविंश पटल ] [ ४५५ मोटटमोटमा । वामो भूरिरिभूमो वाटटरीत्वत्व रीटट ।' यह श्लोक यम स्वरूप बताया गया है जो वैरियों के विनाश करने वाला है ।२४। ।२५। इसको अर्थात् यन्त्र (चक्र) को प्रेतके शूलाधिरूढ़ कपाट पर चिता के अङ्गार, आठ विष निम्बिका निर्यास के काजल से कौआ के पंख से लिखना चाहिये यह निग्रह नामक यन्त्रहै । बिभीत वृक्षके नीचे, वल्मीक पर, श्मशान में और चौराहे पर वायु के दक्षिण होने पर मन्त्र साधक को आधी रातमें निखनन करना चाहिए इससे सर्वथा शत्रु एक सप्ताह मेंमृत्यु को प्राप्त हो जाता है ।२६।२७। अथवा वह शत्रु महान् रोग से ग्रस्त होता है अथवा पतित हो जाता है ।२८। शिलायामिष्टकायां वा चक्रमेतत् प्रकल्पितम् । मर्कंटी विषदण्डीभिः समालिप्तमधोमुखम् ।२६ यत्र रात्रौ खनेत्तत्र भयोभूयोऽशुभम्भवेत् । लिखेच्चतुः षष्ठिपदेय् कालीपीशादिकन्यादि यमात्मकेन । श्लोकेन संवेष्ट्य कृशानुवायुबीजावृतं यन्त्रमिदं विदध्यात्।३० निशा विषमबीदण्डोमर्कंटीभिरधोमुखम् । निखनेद्यत्र तत्र स्यान्नृणामुच्चाटनं सदा । सस्यहानिमनावृष्ठि गवां नाशं करोति तत् ।३१ आख्यां तुम्बुरुमध्यतः स्मरगतामालिख्य जम्भादिकाम् विद्यां दिग्गतपत्रकेष्वथ लिखेत् देवीदलेषु स्मरम् । कोणस्थेषु सनामकं बहिरतः पात्रांगु शाध्यां वृतम् । यन्त्रं वश्यकरं ग्रहादिभयहृत् क्षुद्राभिचारापहम् ।३२ जम्भेजम्भिनि ठद्वन्द्वं मोहे मोहिनि ठद्वयम् । अन्धेअन्धिनि ठद्वन्द्वं रुन्धे रुन्धिनि ठद्वयम् ।३३ शिला पर अथवा ईंट पर इस चक्र को प्रकल्पित करे । विषदंडी से समालिप्त कर नीचे की ओर मुख करदे। जहाँ परभी रात्रिमें खनन करे वहाँ बारम्बार अशुभ होता है ।२६। अब उच्चाटन बताते हैं-श्लोक के रूप में काली का मन्त्र है । चौसठ पदोंमें यमात्मक काली मीशादि कंन्या

४५६ ] [ श्रीशारदा तिलक प्रभृति लिखे और श्लोक से संवेष्टित करके कृपालु वायु बीजों से आवृत्त इस यन्त्रों को बनाना चाहिये ।३०। निशा-विष मषी ब्रह्म दण्डी और मर्कटी अर्थात् कपि कच्छु से नीचे की ओर मुख करके जहाँ पर भी निखनन करे वहाँ मनुष्योंका सदा उच्चाटन होता है। यह सस्य अर्थात् फसल की हानि-वर्षा का न होना तथा गौओं का नाश किया करता है ।३१। कर्म के साथ ही साध्य और साधक का नाम होना चाहिये । कर्णिका में स्थित तुम्बुरु मन्त्र में कहे गये चार बीजक और नायक ने सहित स्मर को दिग्देशों में लिखे । तुम्बुरु के मध्य में स्मरगत जम्प- दक लिखें और दिग्गत दलों में विद्या लिखे तथा देवी दलों में स्मर को लिखे । कोणस्थों में नाम सहित लिखे । बाहर पाशङ्कज में रत लिखे । यह मन्त्र वश्य करने वाला और ब्रह्मादि के भय के हरने वाला तथा ग्रह अभिचार को हरण करने वाला है। इसका तात्पर्य यह है किदेवी बीज के मध्य में काम बीज और उसका नाम होना चाहिये । इस प्रकार से कोण चतु.दलों में लिखे में तुम्बुरुदेवता है ।३२-३३। हित्वा कामं लिखंत्शास्तिः यन्त्रेऽस्मिम् नृकपालके । सन्ध्यासु तापयेतेतदुच्चैः साध्य वशं नयेत् ।३४ हित्वा शान्ति लिखेद्धर्मं पटे वा नरचर्मणि । वह्नि वायुगृहावोतं स्मशानस्थंपूर्त्ति हरेत् ।३५ त्यक्त्वा वर्म लिखेद्स्त्र' फलकेऽक्षतरूद्भवे । वह्नि वायुयुतं नाम विषाढ्यरुधिरेण तत् ।३६ चत्वरे निखनेद्यन्त्रं विद्वेषं कुरुते मिथः । हित्वा रं ध्यकारौद्वौ लकार मध्यतो लिखेत् ।३७ धरापुरेण बीजं तदिष्टकान्तर्निवेशितम् । सर्वेषां स्तम्भनं कुर्यान्नात्र कार्या विचारणा । अब वश्य प्रयोग बतलाते हैं-काम के पाँच बीजकों का त्याग करके दीर्घ इकार अर्थात् विन्दु के सहित शान्ति को लिखे और शान्ति के स्थान में वर्म अर्थात् हूँ लिखे । मनुष्य के कपाल में इस मन्त्र में लिखना

एकोनविंश पटल ] [ ४५७ चाहिये तथा संध्याओं में अतिशय से इसको तापे तो साध्य जो भी हो उसको वश्य लेता है ।३४। अथवा शान्ति का त्याग करके पट में अथवा नरचर्म में वायु गृहातीत वह्नि की श्मशान में स्थित पूरि का हरण करे । वर्म का त्याग करके विभीतक के पदे अस्त्र को लिख और विश से युक्त रुधिर से वायुसे युक्त वह नाम तुम्बुरु बीज मिलकर वहाँ पर लकार लिखे । इस यन्त्र को चत्वर में लिखना कर देवे तो परस्पर में विशेष कर देता है । रेफ और मकार दोनों को त्याग करके मध्य में लकार लिखना चाहिये । धरापुर से अर्थात् काम में तुम्बुरु के मध्य में वायुबीज को लिखे और दो ईंटों के मध्य में निवेशित कर देवे । यह सब का स्तम्भन करता है इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।२५-३८। हित्वा लकारं तन्मध्ये वायुबीजं समालिखेत् । विषरक्तमषीकाकपुरीषैर्ध्वजवाससि । ३६ श्मशाने निहितं कुर्यात् कुलोच्छेदं स्ववैरिणाम् । मुक्त्वावायुमयं बीजं तत्र फट्कारमालिखेत् ।४० प्रेतवस्त्रे काकस्य रुधिरेण यथाविधि । ईप्सिते निक्षिपेत्स्थाने विद्वेषं कुरुते नृणाम् ।४१ मेस्त्रबीजमपास्यास्मिन् लकारं सार्णसंयतम् । विलिखत्पत्रमेतस्यात् लोहत्रयसमावृतम् ।४२ सर्वरोगप्रशमन कृत्याद्रोहादिशान्तिदम् । विहाय बीजं लृङ्कारं ग्लौं कारं तत्र संलिखेत् ।४३ क्षकारणावृतं वाह्ये पाशाङ्कुशवृतं पुनः । ठपरेणवृतं भूयो भूमिमण्डलमध्यगम् ।४४ लकारैर्बिन्दुसंयुक्तैर्वेष्टितं तद्वहिः क्रमात् । सर्गान्तमातृकाबीज सर्वं वृत्तेन वेष्टितम् ।४५ कौशेयकर्प्पटे कॢप्तमिष्टकाद्वयमध्यगम् । सेनाग्रे निखनेद्यन्त्र स्तम्भेनं कुरुते ध्रुवम् ।४६

४५८ ] [ श्रीशारदा तिलक ल्कार को त्याग करके उसके मध्य में वायु बीज को लिखे तथा उसे वि-रक्त-मषी तथा कौए के मल से ध्वज वस्त्र पर लिखना चाहिए। फिर उसे श्मशानसे निहित कर देवे तो अपने शत्रुओं का कुलो च्छेद कर दिया करता है। वायुमय बीज का त्याग करके वहां पर फट्कार लिखे । शव के वस्त्र पर कौए के रुधिरसे विधि के सहित लिखे और उसको अभीष्ट स्थान में निखनन कर देवे तो मनुष्योंमें विद्वेष कर दिया करता है। इसका तात्पर्य यह है कि जिनमें विद्वेषण करना होवे दोनों उस स्थान का उल्लघन करे ऐसे ही स्थान में गाड़ना चाहिए । । ३६-४१। इसमें स्त्र बीज का त्याग कर सार्ण से युक्त लकार को विशेष रूप से लिखे । यह मन्त्र लोहत्रय समावृत होना चाहिए। यह समस्त रोगों का शमन करने वाला और कृत्या द्रोह आदि की शान्ति करने वाला है। लृकार बीज का त्याग करके वहाँ पर ग्लौंकार लेखन करे ।४२।४३। बाह्य में क्षकार से आवृत और फिर पाशांकु से वृत होवें । फिर ठ पर से वृत हो और भूमि मण्डल के मध्य में जाने वाला हो। उसके बाहिर क्रम से बिन्दु से युक्त लकारोंसे वेष्टित होवे । सर्गान्त मातृ का बीज सब वृत से वेष्ठित होवे ।४४-४६। मध्ये श्रीनरसिंहबीजमथ तद्बाह्ये स्वरान् केसरे । वारीट् चन्द्रयमेन्द्रदिक्षु विखिलेन्मध्ये मनुङ्गारुडम् । अन्तस्थाम् मरुदग्निनिऋ तिशैवेष्वालिख्य वर्णावृतम्। यन्त्र मर्गिभिरष्टाभिः परिवृतं संवर्तकैङ्गारुडम् ।४७। सवर्तकोनेत्रयुतः पार्श्वस्तारोग्निसुन्दरी । गारुडो मनुराख्यातो विषद्वयविनाशनः ।४८ स्मरन् गरुडमात्मानं मन्त्रमेनं जपेन्नरः । विषमालोकनेनैव हन्यान्नागकुलोद्भवम् । ६ मध्ये वार्ण भृगुस्थ विलिखतु विधिवत्साध्यनाम्ना समेतम् किञ्जल्केषु स्वराः स्युर्व्वसुदलविवरेष्वालिखेन्मध्यबीजम् ।

एकोनविंश पटल ] [ ४५६ काद्यार्णान् केमरेषु द्विगुणवसुदलेष्वर्पयेन्मध्यबीजम् । यन्त्रं संजीवनारूयं सोललपुणत क्षुद्ररोगापहारि ।५० मध्ये पिण्डमघोदलाद्विषु लिखेद्धारीशताराधिप प्रताधीशवरशक्रदिक्षु विमतेर्मध्ये चवर्णां लिखेत् । यादोन्मारुतवह्निरराक्षसशिवेष्वर्णान् बहिर्वेष्टयेत् । काद्यै वर्मविलोचनन कलितं पिण्डाख्ययन्त्रं परम् ।५१ अब गारुड़ यन्त्र बताया जाता है कौशेयवस्त्रमें क्लप्त और दो ईंटों के मध्य में रहने वाला यन्त्र को सेनाग्र में गाड़ देवे तो निश्चय ही स्तम्भन किया करता है। कर्णिकाके मध्य में श्री से युक्त नरसिंह बीज लिखे। यहाँ श्री शब्द से एक देश रेफ का ग्रहण किया गया है। उसके बाह्य में केसर स्वरों को लिखे तथा मध्य में गारुड़ मन्त्र को लिखना चाहिए। इनको वारीट चन्द्र यम और इन्द्र दिशाओं में लिखे । बिन्दु सहित अन्तस्थ वर्णों को मरुद्अग्नि निऋं ति और शिव दिशाओं में लिखकर वर्णों वृत्त करे । विसर्ग युक्त आठ संवर्तकों से परिवृत गारुढ़ यन्त्र होता है ।४७। अब गारुड़ मन्त्र बतलाते हैं--नेत्रयुक्त सम्वर्तक अर्थात् इकारसे संयुत क्षकार और पार्श्व अर्थात् पकार, प्रणव तथा अग्नि सुन्दरी-स्वाहा-इस प्रकार का गारुड़ मन्त्र कहा गया है, जो कि स्थावर और जङ्गम दोनों विषों का विनाश करने वाला होता है। इस गारुड़ मन्त्र का स्मरण करता हुआ जो मनुष्य जाप किया करता है वह वलो- कन मात्रसे ही नागकुलसे समुत्पन्न विष का हनन कर देता है ।४८-४६। अब सञ्जीवन मन्त्र बताया जाता है-आठ दलों वाली कर्णिका में सकार में स्थित वकार से युक्त बीज को लिखे तथा विधि के सहित साध्य का नाम लिखना चाहिए। किञ्जल्कों में स्वर होने चाहिए । द्विगुण वसु दलों में मध्य बीज को लिखे तथा केसरों में कादि शान्त वर्णों का लेखन करे । द्विगुण वसुदल का अभिप्राय षोड़श दलों से होता है यह प्रथम पटल में कथित सञ्जीवन नामक यन्त्र है जो क्षुद्र रोगों का अपहरण करने वाला है, इसका मृत्यु जप देवता है ।५०। अब पिण्ड

४६० ] [ श्रीशारदा तिलक मन्त्र बतलाते हैं—अष्ट दलों वाली कर्णिका के मध्य में उन-उन बीजों से संयुत विदर्भित नाम लिखना चाहिये । वश्य प्रयोग में पाश बीज, शांति प्रयोग में वरुण बीज, उच्चाटन में क्रोधाग्नि बीज लिखे । मध्य में पिणु और नीचे दलादिल में पश्चिम में—उत्तर दिशा में दक्षिण दिशा में और पूर्व दिशा में गरुड़ मन्त्र के मध्य में कर्णिकान्तर अन्त्य अक्षर लिखे अर्थात् चवर्णों को लिखना चाहिए । बाहर वदि अर्थात् परवल आदि को लिख । पश्चिम उत्तर तथा पूर्व दिशाओं में बाहिर अर्णों को वेष्टित करे । दक्षिण नाम विलोचन अर्थात् दीर्घ इकार से संयुत क-आद्यों से कल्पित पिण्ड नामक परम यन्त्र होता है । यहाँ पर पिण्डान्या देवता है ॥५१॥ मनुस्वरॆन्दुजेशोग्निंसंयुतश्चपुराननः । पिण्डवीजमिदं प्रोक्त पुंसां सर्वार्थसाधकम् ।५२ बीजेनानेन सञ्जप्तं मन्त्रं रक्षाकरं परम् । आयुरारोग्यजननं लक्ष्मीसौभाग्यवश्यदम् ।५३ चौरसर्पमृगव्यालभूतामयंनिकृन्तनम् । गर्भरक्षाकर स्त्रीणां पुत्रदं क्षुद्रनाशनम् ॥ धृतं मूर्ध्नि करोत्येतल्लोकवश्यमणत्तमम् ।५४ मध्ये तोयगृहे लकारविवरे साण्णाढ्यसाध्यं । पत्रेष्वष्टसु हंसमन्त्रमभितोह्मार्णसंवेष्टितम् । यन्त्रं भूमिगृहेण वेष्टितमिदं मूर्द्धना सदा धारितम् । हन्यात् क्षुद्रमहाज्वरामयरिपून् दद्यात् यशः सम्पदः ।५५ ईकारमध्ये विलिखेत्ससाध्यं तमष्टपत्रेषु पुनर्विलिख्य । संवेष्टयेत् तेन धरापुरस्थं यन्त्रं भवेद्वश्यकं नराणाम् ।५६ ताम्रपात्रे समालिख्य यन्त्रमेतत्प्रपूजयेत् । वशयेत्सकलान्मर्त्यान्नात्र कार्या विचारणा ।५७