शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 457, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंश पटल ] [ ४५७ चाहिये तथा संध्याओं में अतिशय से इसको तापे तो साध्य जो भी हो उसको वश्य लेता है ।३४। अथवा शान्ति का त्याग करके पट में अथवा नरचर्म में वायु गृहातीत वह्नि की श्मशान में स्थित पूरि का हरण करे । वर्म का त्याग करके विभीतक के पदे अस्त्र को लिख और विश से युक्त रुधिर से वायुसे युक्त वह नाम तुम्बुरु बीज मिलकर वहाँ पर लकार लिखे । इस यन्त्र को चत्वर में लिखना कर देवे तो परस्पर में विशेष कर देता है । रेफ और मकार दोनों को त्याग करके मध्य में लकार लिखना चाहिये । धरापुर से अर्थात् काम में तुम्बुरु के मध्य में वायुबीज को लिखे और दो ईंटों के मध्य में निवेशित कर देवे । यह सब का स्तम्भन करता है इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।२५-३८। हित्वा लकारं तन्मध्ये वायुबीजं समालिखेत् । विषरक्तमषीकाकपुरीषैर्ध्वजवाससि । ३६ श्मशाने निहितं कुर्यात् कुलोच्छेदं स्ववैरिणाम् । मुक्त्वावायुमयं बीजं तत्र फट्कारमालिखेत् ।४० प्रेतवस्त्रे काकस्य रुधिरेण यथाविधि । ईप्सिते निक्षिपेत्स्थाने विद्वेषं कुरुते नृणाम् ।४१ मेस्त्रबीजमपास्यास्मिन् लकारं सार्णसंयतम् । विलिखत्पत्रमेतस्यात् लोहत्रयसमावृतम् ।४२ सर्वरोगप्रशमन कृत्याद्रोहादिशान्तिदम् । विहाय बीजं लृङ्कारं ग्लौं कारं तत्र संलिखेत् ।४३ क्षकारणावृतं वाह्ये पाशाङ्कुशवृतं पुनः । ठपरेणवृतं भूयो भूमिमण्डलमध्यगम् ।४४ लकारैर्बिन्दुसंयुक्तैर्वेष्टितं तद्वहिः क्रमात् । सर्गान्तमातृकाबीज सर्वं वृत्तेन वेष्टितम् ।४५ कौशेयकर्प्पटे कॢप्तमिष्टकाद्वयमध्यगम् । सेनाग्रे निखनेद्यन्त्र स्तम्भेनं कुरुते ध्रुवम् ।४६