शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 443, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टादश पटल ] [ ४४३ षट् अङ्गों का विन्यास करके इसके पश्चात् निम्न प्रकार से देव का चिन्तन करना चाहिये ।१४३। चण्डेश्वरं रक्ततनुं त्रिनेत्रं रक्तांशुकाढ्यं हृदि भावयाम् । टङ्कं त्रिशूलं स्फटिकाक्षमालां कमण्डलुं बिभ्रतमिन्दुचण्डम् ।१४४ वर्णलक्षं जपेन्मन्त्रं होमं कुर्याद्दशांशतः । मधुरत्रयसंयुक्तैर्विशुद्धैस्तिलतण्डुलैः ।१४५ पञ्चाक्षरोदिते पीठे चण्डेशं साधु पूजयेत् । मूर्त्तौ बीजेनं कॢप्तायः तत्क्रमो बिन्दुसंयुतः ।१४६ चण्डेश्वराय हृद्बीलपूर्वः पूजामनुर्मतः । अङ्गैर्मातृभि राशैश्शंङ्खाद्यै राय्धैर्यजेत् ।१४७ चतुरावरणं प्रोक्तं चण्डेशस्य समर्चनम् । इति सिद्धे मनौ मन्त्री धनवाञ्जायतेऽचिरात् ।१४८ अब ध्यान करने का प्रकार बतलाया जाता है-रक्त वर्ण के शरीर को धारण करने वाले-तीन नेत्रों से समन्वित-रक्त वर्ण वस्त्रों से आढ्य टङ्क--त्रिशूल--स्फटिकों की अक्ष माला-- कमण्डल और चन्द्र के खण्ड को धारण करने वाले खण्डेश्वर को हृदय में भी भावना करता हूँ । अर्थात् अपने हृदय में ध्यान किया करता है ।१४४। इस मन्त्र में जितने भी वर्ण है उतने ही लाख इस मन्त्र का जाप करना चाहिये और जो भी जप किया जावे उसके दशम भाग का मन्त्र के ही द्वारा होम करना चाहिये । हवन तीनों प्रकार के मधुरों से संयुक्त तिलों तथा तण्डुलों के द्वारा करे ।१४५। पाँच अक्षरों से उदित पीठ पर खन्डेश का भली-भाँति अर्चन करना चाहिए । बीज के द्वारा कॢप्त सूत्ति में उसका विन्दु से संयुक्त कूर्म है ।१४६। खण्डेश्वरके लिये हृद् बीज पूर्व में रहने वाला इसकी पूजा का मन्त्र माना गया है । अङ्गों से मातृकाओं के द्वारा वज्र आदि आयुधों से युक्त दिक्पालों का यजन करना चाहिए ।१४७। खन्डेश का समर्थन चार आवरणों से समन्वित कहा गया है । इस रीति से मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर मन्त्र