शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 444, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ें४४४ ] [ श्रीशारदा तिलक के धारण करने वाले पुरुष थोड़े ही समय में धनवान् हो जाया करता है ।१४८। तर्पयेन्मनुनानेन नित्यमष्टोत्तरं शतम् । श्रियमाप्नोति महतीं पुत्रमित्रसमन्वितः ॥१४६ प्रियङ्गकुसुमैः फुल्लोस्तत्काष्ठोज्वलितेऽनले । जुहुयादयुतं मन्त्री पुरक्षोभः प्रजायते ॥१५० साध्यवृक्षत्वचो लोण पिष्ट्वा पिष्टसमन्वितम् । पुत्तलीं रुचिरां कृत्वा प्रतिष्ठाय समीरणम् ॥१५१ इसी मन्त्र के द्वारा मन्त्रधारी पुरुष को चाहिये कि नित्य ही देव का तर्पण किया करे । ओर एक सौ आठ बार तर्पण अवश्य ही करना चाहिये । इस तर्पण का यह प्रभाव होता है कि वह तर्पण करने वाला व्यक्ति अपने पुत्रों और मित्र मण्डलीके सहित बहुत बड़ी श्री की प्राप्ति का लाभ लिया करता है ।४६। मन्त्र के धारण करने वाले पुरुष को प्रियङ्ग के काष्ठों के द्वारा प्रज्वलित किये हुये अग्निमें खिले हुये प्रियङ्ग के पुष्पों के द्वारा दश सहस्र बार हवन करना चाहिये । इससे पुरक्षोभ हो जाता है ।१५०। साध्य वृक्ष की त्वचा अर्थात् उसका वल्कल और लोण इन दोनों को पीसकर पिष्ट से समन्वित करे । इसके द्वारा एक पुतली की रचना करनी चाहिये । यह पुतली परम सुन्दर बनानी चाहिये । इसकी रचना करके फिर उसमें शास्त्र की विधि के अनुसार प्राणों की प्रतिष्ठा करनी चाहिये १५१। छित्त्वा छित्त्वा प्रजुहुयादष्टोत्तरशतं निशि । सप्ताहमेवं कुर्वीत साध्यो दासो भवेत्तस्यम् ॥१५२ शैवमन्त्रेषु निष्णातश्चण्डेश्वरमनुं भजेत् । सर्वान्कामानवाप्नोति परत्रेह च नन्दति ॥१५३ धरापोऽग्निमरुद्व्यो ममखेशेन्द्वर्कमूर्त ये । सर्वभूतान्तरस्थाय शङ्कराय नमोनमः ॥१५४