शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादश पटल ] [ ४४५ श्रुत्यन्तकृतवासाय श्रुतये श्रुतिजन्मने । अतीन्द्रियाय महसे शाश्वताय नमोनमः ॥१५५ इस पुत्तलिका का छेदन कर-करके रात्रि के समय में एक सौ आठ बार प्रज्वलित अग्नि में आहुतियाँ देवे । इसी रीति से बराबर सात दिन तक किया करे तो वह साध्य ही आकर दास हो जाया करता है ।१५२। जो पुरुष भगवान् शिव से सम्बन्धित मन्त्रों के ज्ञान में परम निपुणात हो उसको ही चण्डेश्वरके मन्त्र का सेवन करना चाहिये । यह मनुष्य मन्त्र के सेवन करने से सभी मनोवाञ्छित कामनाओं को प्राप्ति कर लिया करता है । यह इस लोक में तो परम सुख सम्पन्न होता ही है ओर परलोक में पहुँचकर परमानन्द का सुख भोगा करता है ।१५३। धरा (भूमि), आपः, जल, अग्नि, मरुत, व्योम ( आकाश ) मखेश, इन्दु और अर्क, सूर्य की मूर्त्ति वाले तथा समस्त भूतोंके अन्तर में स्थित शंकर भगवान् के लिये वारम्वार नमस्कार है ।१५४। शैव मन्त्रों के अन्त में सर्वत्र भगवान् शिव का स्तवन होता है । मखेश का अर्थ यजमान होता है । श्रुति के अन्त में किए हुये वास वाले, भूतिस्वरूप, श्रुति के जन्म वाले इन्द्रियों की पहुँच से परे—शाश्वत अर्थात् तेज स्वरूपके लिए बारम्बार नमस्कार है ।१५५। स्थलसूक्ष्मविभागाभ्यामनिर्देश्याय शम्भवे । भवाय भवसम्भूतदुःखहन्ते नमोऽस्तुते ॥१५६ तर्कमार्गातिदूराय तपसः फलदायिने । चतुर्वर्गवदान्याय सर्वज्ञाय नमोनमः ॥१५७ आविमध्यान्तशून्याय निरस्ताशेषभीतये । योगिध्येयाय महते निर्गुणाय नमोनमः ॥१५८ { विश्वात्मनेऽविचिन्त्याय विलसच्चन्द्रमौलये । कन्दर्पदर्पकालाय कायहन्ते नमोनमः ॥१५९