शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 447, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टादश पटल ] | ४४७ उसने योगीराज परम महान् शिव को भी अपने चक्र में फाँस लेने का कुचक्र अज्ञानवश चलाया था। किन्तु शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोल- कर उस काम को भस्म कर दिया था। उसकी पत्नी रति की अनुनय- विनय पर जीवित किया किन्तु उसे अङ्ग रहित ही जीवदान दिया था इसी से काम का नाम अनङ्ग है। काल सबका ही हनन करने वाला है देव-दानव-मानव सभी कालके ग्रास एक न एक दिन हो जाया करते हैं इसके प्रभाव से कोई भी अछूता नहीं रहा करता है, किन्तु भगवान् शिव उस काल का भी हनन कर देने वाले हैं और काल उनसे भयभीत रहा करता है। उन शम्भु के लिए बारम्बार प्रणाम है। १०६। विषाशनाय विहरद्वृषस्कन्धमुपेयुषे। सरितामसमाबद्धकपर्दति नमोनमः।१६० शुद्धायशुद्धभावाय शुद्धानामन्तरात्मने। पुरान्तकाय पूर्णाय पुण्यनाम्ने नमोरमः।१६१ भक्तानां निजभक्तानां भुक्तिमुक्तिप्रदायिने। विवाससे विवासाय विश्वेशाय नमोनमः।१६२ त्रिमूर्तिमूलभूताय त्रिनेत्राय नमोनमः। त्रिधाम्नां धामरूपाय जन्मघ्नाय नमोनमः।१६३ देवासुरशिरोरत्नकिरणारुणिताङ्घ्रये। कान्ताया निजकान्तार्थे दत्तार्द्धाय नमोनमः।१६४ स्तोत्रेणानेन पूजायां प्रीणयेज्जगतः पतिम्। भुक्तिमुक्तिप्रदं भक्त्या सर्वज्ञं परमेश्वरम्।१६५ भगवान् शम्भु विष के अशन कर देने वाले हैं। समुद्र के मन्थन करने पर कालकूट विष भी उसमें निकला था। सभी उस महा विष को देखकर भयभीत हो गये और सबने भगवान् शिव से प्रार्थना की तो इन्होंने सबको अभयदान देकर उस कालकूट विष का पान करके अपने कण्ठ में धारण कर लिया था। इससे विष को आश्रय