शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 453, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंश पटल ] [ ४५३ प्रणवः श्री ततोदंष्ट्रा तत्परं विकृत ततः । क्षानताय वधूवह्निर्मन्त्रोऽयं द्वादशाक्षरः । १६ इसके अनन्तर अमुक-अमुक का घोर-अघोर का जो विद्वेष द्वय है वह घुर्घु टिकके द्वारा ईरित हुँ-फिट् विद्याकही गयी है। इसके अनन्तर मारण यन्त्र बतलाते हैं-उसकी विधि यह है-आदि में दोनों पाश्वों में महिषक चशिरों को लिखकर उसके मध्य में यन्त्र का समान करे । बाहर अष्टगुण वस्त्रमें विधि से उस मन्त्रको लिखना चाहिये । त्रिवर्तुल का लेखन करके मध्य में दक्षिणोत्तर रूप से दो रेखायें लिखकर और पूर्व पश्चिम रूप से दी रेखायें लिखे । आग्नेल आदि कोणोंमें चार रेखायें लिखित करके दिशाओं स्थित रेखाओं के अग्रभागों में आठ शूलों को कोण रेखा के अग्र भागों में (यही शूलों का चतुष्टय है) लिखकर- वहाँ शास्त्र में कथित प्रकार से मन्त्र के अक्षरों को लिखना चाहिए । वसुपद विकरों में आठ वर्णों को लिखकर पीछे मन्त्र के वर्णों को लिखे । यह प्रेतराज का मन्त्र होता है, जिसको विधिवत् बतला दिया गया है, शूलोद्यत् बारह वर्णों का है । १५-१७। घृमान्धकान्तय स्वाहा-यह आठ वर्णों का मन्त्र है । प्रार्थना यह है-यमराज सदोमेय गये दोरुणयोदय, यदि योनि अपक्षेय ओर निरामय । १८। कुछ मनीषी प्रथम मायष्टी पूर्व विकृत तनं हुँ फट् स्वाहा-ऐसा मन्त्र कहते हैं-यह द्वादश अक्षरों का मन्त्र होता है । १६। विषवृक्षस्य भलके नृचर्मणि पटेऽथवा । आलिख्याष्टविषैरेतत् श्मशाने निखनेत्तन्निशि । २० ज्वरण महता विष्टा मूर्छाकुलितमानसः । रिपुर्गच्छति पक्षेण यमलोकं न संशयः । २१ एकाशीतिपदेषु मध्यदहने साध्यं लिखेदुधुं पुनः । क्षभ्रू ब्लूमिति दिग्गतासु विलिखेत् बीजानि पंक्तिष्वथ । शिष्टेष्वीशनिशाचरादि विलिखेत् कालोमनुं पंक्तिश- स्तद्बांहे यमवातमग्निपवनाऽऽव्रीतच यन्त्र लिखेत् । २२