भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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एकोनविंश पटल ] ६ ४४६

एकोनविंश पटल

॥ यन्त्र प्रकरण ॥

अथ वक्ष्यामि यन्त्राणां भेदांस्तन्त्रेषु गोपितान् । ये साधयन्ति सततं मन्त्रिणोनिजवाञ्छितम् ॥१ मार्णं लिखेत् सार्णयुतं स्वसाध्य वर्गाढ्यपत्रे स्वरकेसराब्जे । बहिः सदीर्घेर्गगनैः प्रवीतं रक्षाकरं यन्त्रमिदं प्रशस्तम् ॥२ पुटीकृते भूमिपुरस्य युग्मे मायां लिखेत् तन्मध्यगसाध्ययुक्ताम् । वकारकोणेन महीपुरेण संवेष्टितं वश्यकरं तदुच्चैः ॥३ मध्ये सार्णविभित प्रपुटित मृत्युञ्जयत्र्यक्षरैः । क्षान्तस्थं निजसाध्यनाम विलिखेत् किञ्जल्कसंस्थान् स्वरान् पत्रेष्वष्टसु नाममन्त्रपुटितं वर्गास्तदग्रेष्वथो । यन्त्रं पद्मपुटीकृतं निगदित मृत्युञ्जयाख्यं परम् ॥४ विषज्वरशिरोरोगनाशनं श्रीजयप्रदम् । कान्तिपुष्टिप्रदं वश्यं सर्व कामार्थसाधकम् ॥५ साध्याढ्यचिन्तामणिमग्निगेहे विलिख्य बाह्यंऽनलगेहवीतम् प्रवेष्टयेत् तद्बहिराष्टवर्णमन्त्रेण यन्त्रं ज्वरशान्तिदं स्यात् ॥६ संप्लवसः प्लावयसोयन्त्रोऽष्टाक्षर ईरितः । एष एव भवेद्दक्षो ग्रहज्वरविनाशने ॥७ इनके अनन्तर अब तन्त्रों में पोषित यन्त्रों के भेदों को बतलाते हैं जो सदा ही मन्त्रधारियों के अपने अभीष्ट को साधित किया करते हैं । कर्णिका में स्थित मकार के मध्य में सकार से युक्त अर्थात् बिन्दु के सहित 'स' वर्ग में संयुत अपने साध्य की अर्थात् फल वाचक पद को लिखना चाहिये । कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग—ऊष्मा संज्ञक शषसह और यरलव अन्तस्थ वर्गोंसे युक्त जिसमें दल हों और दो-दो के क्रम से केसरों में जिके स्थर हों तथा बाहर दीर्घ के सहित गगनों से प्रतीत हो ऐसा यन्त्र ही परम श्रेष्ठ रक्षा के करने वाला होता।