शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 465, कुल 511 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंश पटल ] [ ४६५ पिण्डे लिखेद् नाम ससर्गटान्तविदर्भितं सस्वरकेसराढ्यम् । टान्ताष्टपत्रं वसुधापुरस्थं कान्तिप्रदं यन्त्रमिदं ज्वरघ्नम् ।७२ तारादि लद्वयजलद्विठवर्णं वीता टान्तान्तरे विलिखिता विधिनेव माया । साध्याऽऽवृता वाहिरथोवदनार्द्धचन्द्रैर्यन्त्रं शिशोरुरुदियां निनिहन्ति सद्यः ।७३ व्योमार्णमालिख्य सबिन्दुमाख्याविदर्भितं लत्रययुक्तकॊणे । वसुन्धरागेहयुगे निवद्धं यन्त्रं समस्तज्वरनाशन स्यात् ।७४ और दूसरा ज्वर नाशक मन्त्र यह होता है कि पूर्व में कथित पिण्ड में विसर्ग सहित ठकार से युक्त नाम लिखे जो सस्वर केसर से आढ्य हो । भूपुर में स्थित आठ पत्रों में टान्त लिखे तो कान्ति प्रदाता यह मन्त्र ज्वर नाशक होता है ।७२। अब शिशुओं के रुदन का हरण करने वाला मन्त्र बताते हैं-'जल' वं हि ठः स्वाहा'-इस मात्रावृत्ता माया को लिखकर बाहर वृत द्वय करके वहाँ अधोमुख अर्धचन्द्रों से संवेष्टित करके बाँधने से शिशु के रोदनेच्छा का विनाशक होता है और तुरन्त ही रुदन रोक दिया करता है । व्योमार्ण हकार जो बिन्दु और भकार से युक्त हों तथा मध्य में साध्य-साधक के नामों को लिखे और एक कोण में तीन लकार लिखे । ऐसा वसुन्धरा गेह युग में निवद्ध मन्त्र सब प्रकार के ज्वरों का विनाश करता है ।७२-७४। सार्ण नाम विदर्भितं परिलिखेद् वाह्येऽष्टपत्रे भृगुं । पद्मं स्यादथ कादिशान्तलिविमत् त्रिंशद्दलम्बाह्यतः । वीतं तोयपुरेण यन्त्रमुदितं भूर्जोदरे कल्पितम् । भूतव्याधिमपाज्वरप्रशमनं कृत्यापह श्रीपदम् ।७५ चक्र चतुःषष्ठिपदे सबिन्दूनन्तस्थवर्णान् क्रमशो विलिख्य । रेखाशिरः कल्पितशूलयुक्तैं यन्त्रेऽथशातज्वरशान्तिहेतोः।७६ पुटितभूमिपुरद्वयमध्यतः प्रविलिखेद्वनितां गिरिजापतेः । प्रणवमस्य लिखेद्वसुकाणगं ज्वरहर परमेतदुदीरितम् ।७७