भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

पृष्ठ 466, कुल 511 में से

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४६६ ] [ श्रीशारदा तिलक अब अन्य यन्त्र बताया जाता है-आठ दलों वाली कर्णिका में अष्ट पत्रों से वहिर्भाग में सकार लिखना चाहिए । पत्रों के मूल में अर्थात् केसरों के स्थान में हो दो क्रम से स्वर लिखे । तोयतुर से बीत यह मन्त्र भोज पत्र पर लिखे तो भूतादि का प्रकोप-व्याधि और महान ज्वर का शान्त करने वाला तथा कृत्या आहरण कारक श्रीपद् मन्त्र होता है ।७५। चौंसठ पद वाले चक्र में बिन्दु से युक्त अन्तस्थ वर्णों को क्रमशः लिखना चाहिये । अर्थात् प्रथम आवृत्ति में अट्ठाईस कोष्ठों में बिन्दु युक्त प्रकार लिखें दूसरी आवृत्ति में बीस कोष्ठोंमें बिन्दु से युक्त लकार लिखे—तीसरी आवृत्ति में बारह कोष्ठों में बिन्दु युक्त लकार लिखे । अन्तःकोष्ठ चतुष्टय में सबिन्दु वकार लिखे । फिर चक्र की पूजा करे तो यह शीत ज्वर को शान्त किया करता है ।७७। पुटित दोनों भूपुर के मध्य में गिरिजापति अर्थात् शिव को वनिता गौरी को लिखे । आठों कोणों में इसके प्रणव लिखना चाहिये । यह मन्त्र सर्वोत्तम है और ज्वर में हरण करने वाला है ।७७। वाणे लिखेत् नाम शशाङ्कमध्ये टान्तं वहिर्भुमिपुरं पुरस्तात् । वृत्तावृतं यन्त्रमिदं समुक्तं वश्याय नृणां सकलार्तिशान्ते ।७८ सस्वस्तिके दहनगेहयुगे ससाध्यां मायां लिखेन्नागलतादलान्तः । पाशाङ्कुशावृतमिदं निशि तापयेद्योमन्त्रं जपन् व्रजति तं स्वयमेव साध्यः ।७६ षट्कोणेषु विजसाध्यनामसहितां मायां लिखेन्मध्यत- स्तत्कोणेषु विदभितामभिलिखेच्छक्तिं ससाध्याह्वया । वाह्ये भूमिपुरं सकोणमदनं ताम्बूलपत्रे कृतम् । जप्तं खादयितुः प्रिया निशि भवेत् सा तस्य वश्या चिरम् ।८० शक्तौ नाम लिखेच्चतुर्भिरभितोबोजैः समावेष्टयेत् । वीतं शक्तिमनोभवांकुशमनु प्रो बीजकैः पिष्टजे ।