भारतकोश
शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished511 पृष्ठ

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पृष्ठ 468

४६८ ] [ श्रीशारदा तिलक भूमिस्पृष्टं शवस्पृष्टं दग्धं निर्माल्यसंगतम् । विशीर्णलङ्घितं मन्त्री यन्त्रं आतु न धारयेत् ।८४ अथानन्दमयीं देवां शब्दब्रह्मस्वरूपारिणीम् । ईडे सकलसंपत्यै नगत्कारणमम्बिकाम् ।८५ आद्यामशेषजननीमरविन्दयोनेर्विष्णोः शिवस्य च वपुः प्रतिपादयन्तीम् । सृष्टिस्थितिक्षयकरीं जगतां त्रयाणां स्तुत्वागिरं विमलयाम्यहमम्बिके त्वाम् ।८६ पृथ्व्या जलेन शिखिना मरुताम्बरेण होत्रेन्दुना दिनकरेण च मूर्तिभाजः । देवस्य मन्मथरिपोरपि शक्तिमत्ताहेतु स्त्वमेव खलु पर्वतराजपुत्रि ! ।८७ त्रिःस्रोतसः सकललोकसमर्चिताया वशिष्टकारणमवैभि तदेव मात ! । त्वत्पादपङ्कजपरागपवित्रितासु शम्भोजर्- टासु सततं परिवर्तनं यत् ।८८ मन्त्री को भूमि से स्पर्श किया हुआ शव मुर्दा से स्पर्श किया, दधि, निर्माल्य से संगत, विशीर्ण और लाँघा हुआ यन्त्र कर्म भी धारण नहीं करना चाहिये ।८४। इसके अनन्तर आनन्द से परिपूर्ण तथा शब्द ब्रह्म स्वरूपिणी जगत्कारण अम्बिकाका सकल सम्पत्तिकी प्राप्तिके लिये स्तवन करता हूँ ।८५। हे अम्बिके ! मैं अपनी स्तुति करके वाणी को विमल करता हूँ । आप सबकी जननी है, देव समूह की योनि भगवान् विष्णु और शिव के वपु का प्रतिपादन करने वाली हैं । तीनों लोकों के सृजन, स्थिति और विनाशके करने वाली है । ऐसी आपका स्तवनकरके मैं अपनी वाणी को विमल करता हूं ।८३। हे पर्वत राजपुत्रि ! पृथ्वी, जल—अग्नि—वायु—आकाश—होता—इन्दु—दिनकर की मूर्ति