शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (उद्गम)
४६८ ] [ श्रीशारदा तिलक भूमिस्पृष्टं शवस्पृष्टं दग्धं निर्माल्यसंगतम् । विशीर्णलङ्घितं मन्त्री यन्त्रं आतु न धारयेत् ।८४ अथानन्दमयीं देवां शब्दब्रह्मस्वरूपारिणीम् । ईडे सकलसंपत्यै नगत्कारणमम्बिकाम् ।८५ आद्यामशेषजननीमरविन्दयोनेर्विष्णोः शिवस्य च वपुः प्रतिपादयन्तीम् । सृष्टिस्थितिक्षयकरीं जगतां त्रयाणां स्तुत्वागिरं विमलयाम्यहमम्बिके त्वाम् ।८६ पृथ्व्या जलेन शिखिना मरुताम्बरेण होत्रेन्दुना दिनकरेण च मूर्तिभाजः । देवस्य मन्मथरिपोरपि शक्तिमत्ताहेतु स्त्वमेव खलु पर्वतराजपुत्रि ! ।८७ त्रिःस्रोतसः सकललोकसमर्चिताया वशिष्टकारणमवैभि तदेव मात ! । त्वत्पादपङ्कजपरागपवित्रितासु शम्भोजर्- टासु सततं परिवर्तनं यत् ।८८ मन्त्री को भूमि से स्पर्श किया हुआ शव मुर्दा से स्पर्श किया, दधि, निर्माल्य से संगत, विशीर्ण और लाँघा हुआ यन्त्र कर्म भी धारण नहीं करना चाहिये ।८४। इसके अनन्तर आनन्द से परिपूर्ण तथा शब्द ब्रह्म स्वरूपिणी जगत्कारण अम्बिकाका सकल सम्पत्तिकी प्राप्तिके लिये स्तवन करता हूँ ।८५। हे अम्बिके ! मैं अपनी स्तुति करके वाणी को विमल करता हूँ । आप सबकी जननी है, देव समूह की योनि भगवान् विष्णु और शिव के वपु का प्रतिपादन करने वाली हैं । तीनों लोकों के सृजन, स्थिति और विनाशके करने वाली है । ऐसी आपका स्तवनकरके मैं अपनी वाणी को विमल करता हूं ।८३। हे पर्वत राजपुत्रि ! पृथ्वी, जल—अग्नि—वायु—आकाश—होता—इन्दु—दिनकर की मूर्ति
एकोनविंश पटल ] [ ४६६ धारण करने वाले काम देव के शत्रु देव की शक्तिमत्ता की हेतु निश्चय ही आप हैं ।८७। हे माता ! समस्त लोकों के द्वारा पूजित गङ्गा के वैशिष्ट्य का कारण मैं उसी को जानता हूँ । आपके चरण कमल के पराग से पवित्र भगवान् शम्भु की जटाओं में जो निरन्तर परिवर्तन होता है ।८८। आनन्दयेत् कुमुदिनीमधिपः कलानां नान्यामिनः कमलिनीमथनेतरां या । एकस्य मोदनविधौ परमकं इष्टे त्वत्तुप्रपञ्चमभिनन्दयसि स्वदृष्टया ।८६ आद्याप्यशेषजगतां नवयौवनासि । शैलादिराजतनयाण्याति कोमलासि । त्रय्या प्रसूरपि तया न समीक्षितासि । ध्येयासि गौरि ! मनसो न पथि स्थितासि ।६० त्तासाद्य जन्म मनुजेषु चिराद् दुरापं तत्रापि पाटवमवाप्य मिजेन्द्रियाणाम् । नाभ्यर्चयन्ति जगतां जनयित्र ! ये त्वां निःश्रेणिकाग्रमविरुह्य पुनः पतन्ति ।६१ कर्पूरचूर्णहिमबारिविलोलितेन ये चन्दनेन कुसुमैश्च सुजातगन्धः । आराधयन्ति हि भवानि ! समुत्सुकात्वां ते खल्वशेषभुवनाधिभुवः प्रथन्ते ।६२ आविश्य मध्यपदवीं प्रथमे सराजे सुप्तहिराजसदृशी विरचय्य विश्वम् । विद्युल्लतावलयविभ्रममुद्वहन्ती पद्मानि पञ्च विदलय्य समश्नुवाना ।६३ तन्निर्गतामृतरसैरभिषिक्तगात्री मार्गेण तेन निलय पुनरप्यवाप्त ।
४७० ] [ श्रीशारदा तिलक येषां हृदि स्फुरसि जातु न ते भवेयुर्मातर्महेश्वरकुटुम्बिनि ! गर्भभाजः । ६४ आलम्बिकुन्तलभरामभिरामवक्त्रा- मापीवरस्तनतटीं तनुवृत्तमध्याम् । चिन्ताक्षसूत्रकलशालिखिताढ्य- हस्तामावर्तयामि मनसा तव गौरि ! मूर्तिम् । ६५ आस्थाय योगमविजित्य च वैरिशट्- कमावध्य चेन्द्रियगणं मनसि प्रसन्ने । पाशांकुशाभयवराढ्यकरां सुरक्तामा- लोकयन्ति भुवनेश्वरियागिनस्त्वाम् ।६६ कलाओं का अधिप चन्द्रमा कुमुदिनीको आनन्दित करता है । कम- लिनी मध्यने तर को नहीं करता है । एक के मोदन विधि में उसका स्तवन किया जाता है फिर आप तो समस्त प्रप'च को अपने ! दृष्टिपात के द्वारा आनन्दित किया करती है ।७६। समस्त जगतों की आप आद्या हैं अर्थात सब जगतोंसे प्रथम हुई हैं तो भी आप नवयौवन धारण करने वाली हैं। आप पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं तो भी अत्यधिक कोमल हैं, त्रयी को उत्पन्न करने वाली हैं तो भी उस त्रयी के द्वारा समीक्षिता नहीं है। हे गौरि ! आप ध्यान करने के योग्य हैं तो भी मन के मार्ग में स्थित नहीं होती हैं अर्थात मनके द्वारा अचिन्तनीय हैं ।६०। अत्यन्त दुर्लभ मनुष्यों में चिरकाल में दुर्लभ जन्म पाकर भी इन्द्रियों को पटुता प्राप्त किया करता है। हे जगतों के जनन करने वाली ! जो मनुष्य आपका अर्चन नहीं किया करते हैं वे मनुष्य निःश्रेणिका पर अधिरोहण करके भी पुनः अधः पतित हो जाया करते हैं ।६१। हे भवानी ! जो मनुष्य कपूर के चूर्णसे शीतल जल से लोलित चन्दन से और सुन्दर गंध वाले पुष्पों से समुत्सुक होते हुए अशेषभुवनों के अधिभू के प्राप्त करने का प्रयत्न किया करते हैं ।६१। प्रथम सरोज में मध्य पदवी में आविष्ट होकर ! सुप्ताहि राज सदृश विश्व को विरचित करके विद्युल्लता के
एकोनविंश पटल ] [ ४७१ वलय के विभ्रम का उद्वहन करती हुई पाँच पद्मों का विदलन कर समुद्भवत है ।६३। हे माता ! महेश्वर देव की कुटुम्बिनी । उससे निर्गत अमृत रस से अभिविक्त गात्रीं वाली उस मार्ग से पुनः निलय को प्राप्त हुई आप जिनके हृदय में स्फुरण किया करती है वे मनुष्य मुक्त होकर पुनः गर्भ में नहीं आया करते हैं ।६४। लम्बमान कुन्तलों के भार से अभिराम मुख वाली तथा पीवर स्तनों वाली और शरीर के कृश मध्य भाग वाली, चिन्ताक्ष सूत्र से कलश से लिखित हस्तों वाली हे गौरी ! मैं मन से बारम्बार आपकी मूत्ति का आवर्त्तन किया करता हूँ ।६५। योग में समाधिस्थ होकर छं शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके प्रसन्न मन से इन्द्रियों के गण को आवृद्ध करके पाश-अंकुश-अभय और वरदान से सुशोभित दोनों करों वाली हे भुवनेश्वरि! सुरक्त वर्ण वाली आपको योगीगण देखा करते हैं ।६६ उत्तप्तहाटकनिभैः करिभिश्चतुर्भीरा- वर्जिताऽमृतघटैरभिषिच्यमाना । हस्तद्वयेन रुचिरे नलिने वहन्ती- पद्मापि साभयवरा भवति त्वमेव ।६७ अष्टाभिरुग्रविविधायुधवाहिनीभि- र्दोर्वल्लरीभिरधिरुह्य मृगाधिराजम् । दूर्वादलद्युतिरमर्त्यविपक्षपक्षांन् न्यक्कर्वतो त्वमसि देवि ! भवानि ! दुर्गा ।६८ आविन्निदाघजयशीकरशोभिवक्त्रां गुञ्जागुणेन परिकल्पितहारयष्टिम् । पत्रांशुकामसितकान्तिमसङ्गतन्त्रमाद्यां पुलिन्दतरुणामसकृत्स्मरामि ।६६ हंसैर्गतिक्कणितनूपुरद्रकृष्टै- मूर्त्तिरिवाथंवचनैरनुगम्यमानौ !
४७२ ] { श्रीशारदा तिलक पद्माविवोर्ध्वमुखरूढसुजातनालौ श्रीकण्ठपत्नि ! शिरसैव दधे तवाङ्घ्री ।१०० द्वाभ्यां समीक्षितुमतृप्तिमतेव। दृग्भ्यामुत्पाट्य भालनयनं वृषकेतनेन । सान्द्रानुरागतरालेन निरीक्षमाणे जङ्घे उभे अपि भवानि ! तवानतोऽस्मि ।१०१ ऊरू स्मरामि जितहस्तिकरावलेपौ स्थौल्येन पाण्डुरतया परिभूतरम्भौ । श्रोणीभरस्य सहनौ परिकल्प्य दत्तौ स्तम्भाविवाम्ब ! वयसातव मध्यमेन ।१०२ श्रोण्यौ स्तनौ च युगपत्प्रथयिष्यतो- च्चैर्बाल्यात्परेण वयसा परिकृष्णसारः । रोमावलिविलसितेन विभाव्यमूर्ति- र्मध्यस्तव स्फुरतु मे हृदयस्य मध्ये ।१०३ तपे हुए सुवर्ण के सदृश चार हाथियोंके द्वारा आवर्जित अमृतके कलशों से अभिषिक्त होते हुए दोनों हाथों से सुन्दर कमलों को वहन करती हुई पद्मा ! अभयदान और वरदान वाली होती है ।६७। आठों भुजाओं से अत्यन्त उग्र और अनेक आयुधों को वहन करती हुई वल्लरियों के द्वारा मृगाधिराज पर अधिरोहण करके दूर्वादल की द्युति के समान द्युति वाली देवों के विपक्ष में रहने वाले असुरों को करती हुई हे भवानी ! आप ही दुर्गा देवी है ।६८। आवी निदाघ जल के कणों से शोभायुक्त मुख वाली, गुञ्जा गुण से परिकल्पित हार यष्ठि वाली, पत्रांशु काम से-सित कान्ति युक्त, अनङ्ग तन्त्रा पुलिन्द तरुओंकी आद्या आपका मैं वारम्बार स्मरण करता हूँ ।६६। गति अर्थात् गमन से क्वणित नूपुरों द्वारा दूर समाकृष्ट मूर्तों की भाँति हंसों से अर्थ वचनों के द्वारा अनुगम्यमान, ऊर्ध्वमुख सुजात नाल वाले पद्मों के समान हे श्री कण्ठ पत्नि ! मैं शिर से आपके चरणों को धारण करता हूँ ।१००।
एकोनविंश पटल ] [ ४७३ दों नेत्रों से देखते हुए भी अतृप्ति वाले की भाँति वृषकेतन शिव ने भाल में तीसरा नेत्र उत्पन्न करके हे भवानी ! मान्द्र अनुराग से तरल भाव द्वारा निरीक्षमाण दोनों जंघाओं को देखने वाले हैं ऐसी आपको मैं प्रणाम करता हूँ ।१०१। स्थूलता से हस्ती के कर (सूँड) के गर्व को जीत लेने वाले तथा पाण्डुरता से रम्भा (कदली) की तिरस्कृत कर देने वाले ऊरुओं का मै स्मरण करता हूँ । हे अम्ब ! आपकी अवस्था ने मध्यम भाग श्रोणियों के भार को सहन करने वाले परिकल्पित करके स्तम्भों की भांति दिये हैं ।१०२। हे माता ! बाल्य काल से आगे श्रोणी और स्तनों को एक साथ प्रथित करता हुआ आपका मध्य भाग रोमा- वली से विलसित विभाव्य मूर्त्ति वाला मेरे हृदय के मध्य में स्फुरण करे ।१०३। सख्युः स्मरस्य हरनेत्रहुताशमी- रोलावण्यवारिभरितं मवयौवनेन । आपाद्य दत्तमिव पल्वलमप्रधृष्यं नाभिं कदापि तव देवि ! न विस्मरेयम् ।१०४ ईशोपगृह्यसमुनं भसित दधाने काश्मीरकर्द्दममनुस्तनपङ्कजेते । स्नानोत्थितस्य करिणः क्षणलब्धफेनौ सिन्दूरितौ स्मरयतःसमदस्य कुम्भौ ।१०५ कण्ठातिरिक्तगलदुज्ज्वलकान्ति- धाराशोभौ भुजौ निजरिपोर्मकरध्वजे न । कण्ठग्रहाय रचितौ किल दीर्घपाशौ मातर्मम स्मृतिपथं नविंलघयेताम् ।१०६ नात्यायतं रुचिरकम्बुविलासचौर्यं भूषाभरेण विविधेन विराजमानम् । कण्ठं मनोहरगुणं गिरिराजकन्ये! संचिन्त्य तृप्तिमुपयामि कदापि नाहम् ।१०७
४७४ ] [ श्रीशारदा तिलक अत्यायताक्षमभिजातललाटपट्टं मग्दस्मितेन दरफुल्लकपोलरेखम् । विम्बाधरं वदनमुन्नतदीर्घनास यस्ते स्मरत्यसकृदेव स एव जातः ।१०८ आविस्तुषारकरलेखमनल्पगन्ध पुष्पोपरिभ्रमदलिब्रजनिविशेषम् । यश्चेतसा कलयते तव केशपाशं तस्य स्वयं पलति देवि ! पुराणपाशः ।१०६ श्रुतिसुचरितपाकं धोमतां स्तोत्रमेतत् पठति य इह मर्त्योनित्यमार्द्रान्तरात्मा । स भवति पदमुच्चैः संपदां पादनम्रम्रक्षिति- पमुकुटलक्ष्मीलक्षणनां चिराय ।११० हे देवि ! हरके नेत्रकी अग्नि से डरे हुए स्मर के सखा नूतन यौवन ावण्य भरित अप्रधृष्य पल्लवल को दत्त की भाँति अपादित करके आपकी नाभि कभी भी विस्मृत नहीं होती है ।१०४। भसित ईशोप गृह का पिशुन (सूचक) काश्मीर के कर्दम मनुस्तव आपके पकज स्नान करके उत्थित करोंके क्षण भर लब्ध फेनों वाले मदयुक्त हस्तीके सिन्दू- रित कुम्भोंका स्मरण कराते हैं ।१०५। मकरध्वजके शत्रु भगवान शिव की दोनों भुजायें कण्ठ से अतिरिक्त बहते हुए उज्ज्वल कान्ति की धारा से शोभित है । हे माता ! कण्ठ ग्रह के लिये रचित दीर्घ पाश मेरी स्मृति के मार्ग का विलंघन न करे ।१०५। हे गिरिराज कन्ये ! न अत्या यत और रुचिर कम्बु के विलास चुराने वाला तथा अनेक प्रकार के भूषणों के भारसे विराज मान एवं मनोहर गुणसे युक्त कण्ठ का संचि- न्तन करके मैं कभी भी तृप्ति को प्राप्त नहीं हूँ ।१०७। विशाल नेत्रों से युक्त ऐसे अभिजात ललाट यह जो मन्द स्मित से फुल्ल कपोल रेखाओं वाला है । बिम्ब फलके समान अधरोंसे युक्त-उन्नत ओर दीर्घ नासिका वाला मुख है । ऐसे मुख का जो स्मरण करता है वही वास्तव में संसार
विंश पटल ] [ ४७५ में समुत्पन्न हुआ है अर्थात् उसी का जन्म धारण करना सफल होता है । १०७। हे देवि ! आविस्तुषार कर लेखा वाले - अत्यधिक गन्ध से युक्त पुष्पोंके ऊपर भ्रमण करते हुए भौरों के समूहसे संयुक्त ऐसे आपके केशपाश का जो दर्शन किया करता है उसका पुराण पाश स्वयं विनष्ट हो जाया करताहै । १०८। श्रुति सुचरित पाक युक्त मत्याँनित्य धीमानों के इस स्तोत्र को जो आर्द्रान्तरात्मा इस संसार में पाठ किया करता है वह पाठ् नम्र क्षितियों के मुकुट लक्ष्मी के लक्षण वाले सम्पदाओं के उच्च पद को चिरकाल तक प्राप्त किया करता है ।११०।
विंश पटल ॥ योग प्रकरण ॥ अथ योगं प्रवक्ष्यामि साङ्गं संवित्प्रदायकम् । ऐक्यं जीवात्मनोराहुर्यागं योगविशारदाः ।१ जीवत्मनोरभेदेन प्रतिपत्ति परे विदुः । शिवशक्त्यात्मकं ज्ञानं जगुरागमवेदिनः ।२ पुराणपुरुषस्यान्ये ज्ञानमाहुर्विशारदाः । जित्वाऽऽदावात्मनः शत्रून्कामीन्द्योगमभ्यसेत् ।३ कामक्रोधौ लोभमोहौ तत्परं मदमत्सरी । आहुर्दुःखदानेतानरिषड्वर्ग मात्मनः ॥४ योगाष्टाङ्गैरिमञ्जित्वा योगिनोयामाप्नुयुः । यमनियमावासनप्राणायामौ ततः परम् ।५ प्रत्याहारं धारणाख्यं ध्यान सार्द्धं समाधिना । अष्टाङ्गायाहुरेतानि योगिनो योगसाधने ।६
धारणा-ध्यान और समाधि के अङ्ग होते हैं। योगीगण योग के साधन
४७६ ] [ श्रीशारदा तिलक इसके अनन्तर संवित् के प्रदान करने वाले योग का साङ्ग वर्णन करता हूँ। योग के विशारद गण जीवात्मा के ऐक्य वाले योग को कहते हैं ।१। दूसरे विद्वान् जीवात्मा के अभेद द्वारा प्रतिपत्ति को जानते हैं। आगमके ज्ञाता गण शिवभक्ति स्वरूप ज्ञानको योग कहते।२। अन्यविशा- रद पुराण पुरुषके ज्ञान को बतलाते हैं। आदिमें आत्माके शत्रु कामादि को जीतकर फिर योग का अभ्यास करना चाहिए ।३। काम—क्रोध- लोभ-मोह और इनके पश्चात् मद तथा मात्सर्य ये षट् वर्ग आत्मा को दुःख देने वाले होते हैं ।४। योगी गण योग के यम नियमादि आठ अङ्गों के द्वारा इन विजय प्राप्त करके योग को प्राप्त किया करते हैं। यम-नियम-आसन-प्राणायाम इसके अनन्तर हैं । प्रत्याहार- धारणा-ध्यान और समाधि के अङ्ग होते हैं। योगीगण योग के साधन में इन्हीं आठ अङ्गों को बतलाते हैं ।५-६। अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं कृपाऽऽर्जवम् । क्षमाधृतिर्मिताहारः शौचं चेति यमा दश ।७ तपः सन्तोष आस्तिक्यं दान देवस्य पूजनम् । सिद्धान्तश्रवणं चैव ह्रीर्मतिश्च जपो हुतम् ।८ दशैते नियमाः प्रोक्ताः योगशास्त्र विशारदैः । पद्मासन स्वस्तिकाख्यं वज्रं भद्रासनं तथा ।६ वीरासनमिति प्रोक्तं क्र मदासनपञ्चकम् । ऊर्वोरुपरि विन्यस्त सम्यक्पादतले उभे ।१० अगुष्ठौ च निबध्नीयाद्धस्ताभ्यां व्युत्क्रमात्ततः । पद्मासनमिति प्रोक्तं योगिनां हृदयङ्गमम् ।११. जानुर्वोरन्तरे सम्यक्कृत्वा पादतले उभे । ऋजुकायो विशेद्योगी स्वस्तिकं तत्प्रचक्षते ।१२ सीवन्याः पार्श्वयोर्न्यस्येद्गुल्फयुग्मं सुनिश्चलम् । वृषणाद्यः पादपार्ष्णी पाणिभ्यां परिवन्धयेत् ।१३
विंश पटल ] [ ४७७ यह सब दश हुआ करते हैं । उनके नाम ये हैं-अहिंसा अर्थात् किसी भी प्राणी के मन तथा शरीर को चोट न पहुँचाना जो मन वाणी और कर्म के द्वारा होता है । सत्य, अस्तेय (चोरी न करना) ब्रह्मचर्य, कृपा अर्थात् दया आर्जव (सरलता)-क्षमा अर्थात् शक्ति होते हुए भी अपराध के लिये किसी भी प्रकार का दन्ड न देना, धृति अर्थात् धैर्य करना, मिताहार अर्थात् शरीर की रक्षा के लिये अल्प भोजन करना, शौच अर्थात् शुद्धि रखना, ये दश यम हुआ करते हैं ।७। सन्तोष, तप, आस्तिक्य अर्थात् ईश्वर की सत्ता में सत्य विश्वास रखना, दान—देव का पूजन—सिद्धान्तों का श्रवण करना—ह्रीं अर्थात् लज्जा—मत्ति अर्थात् सद्बुद्धि-जप अर्थात् मन्त्रों का जप करना— हुत अर्थात् होम-ये दश नियम होते हैं जो कि योग शास्त्र के विद्वानों द्वारा कहे गये हैं । पद्मासन-स्वास्तिक-वज्र— भद्रासन—वीरासन ये क्रम से पाँच आसन कहे गये हैं। ऊरुओं के ऊपर दोनों पाद तल क्रम से विन्यस्त किये जाते हैं और व्युत्क्रम से दोनों अनुष्ठों को हाथों से निवद्ध करे यही पद्मासन कहा गया है जो कि योगियों के लिये परम हृदयङ्गम होता है ।११। जानु और ऊरुओं के अन्तर में दोनों पाद तलों को भली भाँति करे । योगी ऋजु शरीर वाला होते हुये प्रविष्ट होवे-यह स्वास्तिक आसन कहा जाता है ।१२। सीवनी के पार्श्वों में दोनों गुल्फों को विन्यस्त करे । वृषणों के नीचे प द पाष्र्णियों को हाथों के द्वारा परिबद्ध करे ।१३। भद्रासनं समुद्दिष्टं योगिभिः पूजितं परम् । ऊर्वोः पादौ क्रमान्न्यस्येज्जान्वोः प्रत्यङ्मुखागुलीं ।१४ करौ निदध्यादाख्यातं वज्रासनमनुत्तमम् । एकपादमधः कृत्वा विन्यस्योरौ तथेतरम् ।१५ ऋजुकायो विशेद्योगी वीरासनमितीरितम् । इडयाऽऽकर्षयेद्वायुं बाह्यं षोडशमात्रया ।१६
४७८ ] [ श्रीशारदातिलक धारयेत्पूरितं योगी चतुः षष्ट्या तु मात्रया । सुषुम्णा मध्यगं सम्यक् द्वात्रिंशन्मात्रया शनैः ।१७ नाड्या पिङ्गलया चैनं रेचयेद्योगवित्तमः । प्राणायाममिमं प्राहुर्योगशास्त्रविशारदाः ।१८ भूयो भूयः क्रमात्तस्य व्यत्यासेन समाचरेत् । मात्रावृद्धिक्रमेणैव सम्यग्द्वादश षोडश ।१६ इसको योगियों के द्वारा परम पूजित भद्रासन कहा गया है । ऊरू और पादों को क्रम से न्यस्त करे तथा प्रत्यंग मुखागुलि वाले जानुओं को करे । करों को निर्धारित करे—यह परमोत्तम वज्रासन कहा गया है । एक पैर को नीचे करके तथा ऊरुओं को विन्यस्त करे । योगी को सीधे शरीर वाला होना चाहिये—इसको वीरासन बताया गया है ।१६। योगी चौसठ मात्रा से पूरक धारण करे और सुषुम्ना से मध्य में रहने वाले को भली भाँति बत्तीस मात्रा से शनैः शनैः पिंगला नाड़ी के योग के ज्ञाता को इसका रेचन करना चाहिए । योगशास्त्र के विद्वान् इस प्रकार से करने को प्राणायाम कहा करते हैं ।१७-१८। पुनः व्यत्यास से इस प्रकार समाचरण करे । मात्राओं की वृद्धि के क्रम से भली भाँति षोड़श और द्वादश करे ।१६। प्राणो ऽमो हि द्विविधः सगर्भोऽगर्भएव च । जपध्यानादियियुक्तं सगर्भं त विदुबुर्धाः ।२० तदपेतं विगर्भं च प्राणायामं परे विदुः । क्रमादभ्यस्यतः पुंसो देहे स्वेदोद्गमोऽधमः ।२१ मध्यमः कम्पसंयुक्तोभूमित्यागः परोमतः । उत्तमस्य गुणावाप्तिर्यविच्चीलनमिष्यते ।२२ इन्द्रियाणां विचरतां विषयेषु निरर्गलम् । बलादाहरणं तेभ्यः प्रत्याहारोऽभिधीयते ।२३ अंगुष्ठगुल्फजानूरुसीवनीलिङ्गानाभिषु । हृद्ग्रीवाकण्ठदेशेषु लम्बिकायां तोनसिः ।२४
विंश पटल ] । ४७६ भ्रू मध्ये मस्तके मूर्द्धिघ्न द्वादशान्ते यथाविधि । धारणं प्राणमरुतो धारणेति निगद्यते ।२५ समाहितेव मनसा चैतन्यान्तरवर्तिना । आत्मन्यभीष्टदेवानां ध्यान ध्यानमिहोच्यते ।२६ प्राणायाम सगर्भ ओर अगर्भ दो प्रकार का होता है । जप और ध्यान आदि से युक्त जो होता है उसको बुधगण सगर्भ प्राणायाम कहा करते हैं । इससे विमुक्त जो होता है उसको अगर्भ प्राणायाम कहा जाता है। क्रम से अभ्यास करने वाले पुरुष की देह स्वेद का उद्गम होता है जो अधम है ।२०-२१। मध्यम जो होता है वह कम्प से युक्त होता है। जो भूमि के त्याग करने वाला होता है वह उत्तम कहा गयाहै। उत्तमसे गुणों की अवाप्ति होतीहै जब तक इसका शीलन अभीष्ट होता है ।२२। विषयों में विना अर्गला के जो इन्द्रियों का विचरण होता है । उनका विषयों से बल पूर्वकजो आहरण किया जाता है उसे ही प्रत्याहार कहा जाता है ।२३। अंगुष्ठ - गुल्फ—जानु— ऊरु—सीवनी--लिङ्ग--नाभि—हृदय--ग्रीवा और कण्ठ देशों में-- तालुमूल--मस्तक भ्रूमध्य--मूर्धा द्वादशान्त में विधि पूर्वक प्राण वायु को धारण करना ही धारणा कही गई है ।२५। चैतन्यान्तर- वर्ती समाहित मन से आत्मा में अभीष्ट देवों का जो ध्यान किया जाता है उसी का नाम ध्यान है ।२६। समस्तभावना नित्यं जीवात्मगरमात्मनौः । समाधिमाहुर्मुनयः प्रोक्तमष्टाङ्गलक्षणम् ।२७ षण्णवत्यगलायाम शरीरमुभयात्मकम् । गुदध्वजान्तरे कन्दमुत्सेधाद्व्यंगुलं विदुः ।२८ तत्माद् द्विगुणविस्तारं वृत्त रूपेण शोभितम् ! नाड्यस्तत्र समुद्भूता मुख्यास्तिस्रः प्रकीर्तिताः ।२६ इडा वामें स्थिता नाडी पिङ्गला दक्षिणे मता । तयोर्मध्यगता नाडी सुषुम्णा वंशमाश्रिता ।३०
४८० ] [ श्रीशारदा तिलक पादांगुष्ठद्वये ।ता शिफाभ्यां शिरसा पुनः । ब्रह्मस्थानं समापन्ना सोमसूर्याग्निरूपिणी ।३१ तस्या मध्यगता नाडी चित्राख्या योगिवल्लभा । ब्रह्मरन्ध्रं विदुस्तस्यां पद्मसूत्रनिभि परम् ।३२ जीवात्मा और परमात्मा की नित्य समस्त भावना को ही मुनिगण अष्टांग लक्षण से युक्त समाधि कहा करते हैं ।२९। छियानवे अंगुलि के आयाम वाला उभयात्मक शरीर है । गुदा और ध्वज के अन्तर में कन्द है जो दो अंगुल होता है । उससे दुगुने विस्तार वाला वृत्त रूप से शोभित है । वहाँ पर उत्पन्न हुई नाड़ियाँ मुख्य तीन कही गई हैं ।२८। वाम भाग में स्थित नाड़ी इड़ा होती है और दक्षिण भाग में स्थित पिंगला गाड़ी है । उन दोनों के मध्य में रहने वाली नाड़ी वश के आश्रित सुषुम्ना होती है ।३०। दोनों शदों के अंगुष्ठों के साथ गई हुई पुनः शिर के साथ शिफाओं से ब्रह्म स्थान को समापन्न हुई है । यह सोम—सूर्य और अग्नि का रूप वाली है ।३१। उसके मध्य में गई हुई नाड़ी का नाम चित्रा है जो योगियों की परम प्रिया होती है । उसमें कमल के सूत्र के सदृश ब्रह्म रन्ध्र कहा जाता है ।३२। आधारांशचविदुस्तत्र मतभेदादनेकधा । दिव्यमार्गमिमं प्राहुरमृतानन्दकारणम् ।३३ इडायां सञ्चरेच्चन्द्रः पिङ्गलायां दिवाकरः । ज्ञातौ योगनिदानज्ञैः सुषुम्णायां तु तावुभौ ।३४ आधारकन्दमध्यस्थ त्रिकोणमतिसुन्दरम् । ज्योतिषां निलयं दिव्यं प्राहुरगमवेदिनः ।३५ तत्र विद्युल्लताकारा कुण्डली परदेवता । परस्फुरति सर्वात्मा सुप्ताहिसदृशाकृतिः ।३६ बभर्ति कुण्डलीशक्तिरात्मान हंसमाश्रिता । हंस प्राणाश्रयोनित्य प्राणो नाडीसमाश्रयः ।३७
विंश पटल ] [ ४८१ आधारादुद्गतो वायुर्यथावत्सर्वदेहिनाम् । देहं व्याप्य स्वनाडोभिः प्रयाणं कुरुते बहिः । ३८ वहाँ पर मतों के भेद से अनेक प्रकार के आधार कहे जाते हैं। अमृतानन्द के कारण इसको दिव्य माना जाता है । ३३। इडा में चन्द्र संचरण किया करता है और पिङ्गला में दिवाकर का संचरण होता है। जो योग के निदान के ज्ञाता हैं वे सुषुम्ना में इन दोनों का संचरण जानते हैं । ३४। आधार कन्द के मध्य में स्थित अत्यन्त सुन्दर त्रिकोण है। आगमवेत्ता इसकी ज्योतियों का दिव्य निलय कहते हैं । ३५। वहाँ पर विद्युल्लता के आकार वाली परम देवता कुण्डली है। सबकी आत्मा यह सोते हुये सर्प की-सी आकृति वाली परिस्फुरण किया करती है । ३६। आत्मा हंस के आश्रय में रहने वाली यह कुण्डली शक्ति का विभरण करता है। प्राणों के आश्रम वाला हंस नित्य ही नाड़ियों के समन्वय से युक्त प्राण है । ३७। समस्त देहधारियों के आधार से उद्भूत वायु यथावत् अपनी नाड़ियों के द्वारा देह में व्याप्त होकर बाहर प्रयाण करता है । ३८। द्वादशांगुलमानेन तस्मात्प्राण इतीरितः । रम्ये मृद्वासने शुद्धे पटाजिनकुशोत्तरे । ३६ बध्वैकमासनं योगी योगमार्गपरो भवेत् । ज्ञात्वा भूतोदयं देहे विधिवत्प्राणवायुना । ४० तत्तद्भूतं जपेद्देहं दृढत्वावाप्तये सुधीः । दण्डाकारा गतिर्भूमेः पुठयोरुभयोरधः ।४१ तोयस्य पावकस्योर्ध्वगतिस्तिर्यङ्नभस्वतः । गतिर्व्योम्नो भवेन्मध्ये भूतानामुदयः स्मृतः ।४२
४८२ ] [ श्रीशारदा तिलक धरणेरुदये कुर्यात्स्तम्भनं वश्यमात्मवित् । शान्तिकं पौष्टिकं कर्म तोयस्य समये वसोः ।४३ मारणादीनि मरुतो विपक्षोच्चाटनादिकम् । क्ष्वेदादिनाशनं शान्तमुदये च विहायसः ।४४ अंगुलीर्दृढं बध्वा करणानि समाहितः । अंगुष्ठाभ्यामुभे श्रोत्रे तर्जनीभ्यां विलोचने ।४५ नासारन्ध्रे मध्यमाभ्यामन्त्याभिर्वदनं दृढम् । वध्वात्मग्रणामनसामेकत्व ममनुस्मरन् ।४६ धारयेन्मारुतं सम्यग्योगोऽयं योगिबल्लभः । नादः सञ्जायते तस्य क्रमादभ्यसतः शनैः ।४७ द्वादश अङ्गुलों के मान से यह स्थित है, । इसी से प्राण यह नाम से पुकारा जाता है । रम्भ और शुद्ध मृदु आसन पर जो पट्- अजिन् और कुशा का होता है । उस पर योगी आसन बाँधकर योग मार्ग में परायण हुआ करता है । देह में भूतोदय का ज्ञान प्राप्त होता है जोकि विधि पूर्वक कठोर वायु द्वाराकिया जाता है ।३६-४०। विद्वान् पुरुष को तद्भूत देह की दृढ़ता की प्राप्ति के लिये जाप करना चाहिये । दोनों पुटों के नीचे दन्ड के आकार वाली भूमि की गति है ।४१। जल और पावक के ऊपर नभस्वान की तिर्यक् गति है । मध्य में व्योम की गति है-इस रीति से भूतों का उदय बताया गया है ।४२। आत्मवेत्ता की धरणी के उदय में स्तम्भन और वैश्य करना चाहिये । वसु के समय तोव (जल) का शान्तिक और पौष्टिक कर्म करने चाहिये ।४३। आकाश के उदय में धरणादिक शरे और मरुत से विमक्ष का उच्चाटन आदि करे, क्षेडा का विनाशन शान्त करे ।४४। परम सावधान होकर शङ्गुलियों से श्रवणेन्द्रिय को दृढ़ता से बद्ध करके दोनों अंगूठों से दोनों कानों को तर्जनी
विश पटल ] [ ४८३ अङ्गुलियों से, दोनों नेत्रों को मध्यमाओं से, नासिका के दोनों छिद्रों को तथा अन्य अङ्गुलियों से मुख को दृढ़ता से वद्ध करके आत्मा-प्राण और मन के एकत्व का स्मरण करते हुये वायु को भली-भाँति धारण करे—यह योग योगियों का परम प्रिय होता है। क्रम से शनैः अभ्यास करने वाले के नाद समुत्पन्न हुआ करता है ।४५-४७। मत्तभृङ्गाङ्गनागीतसदृशः प्रथमोध्वनिः । वंशिकास्याविलापूर्णवंशध्वनिनिभाऽपरः ।४८ घण्टारवसमः पश्चाद् घनमेघस्वनोऽपरः । एवमम्यसतः पुंसः संसारध्वान्तनाशनम् ।४६ ज्ञानमुत्पद्यते पूर्वं हंसलक्षणमव्ययम् । पुम्प्रकृत्यात्मको प्र.क्तौ बिन्दुसर्गौ मनीषिभिः । ५० ताभ्यां क्रमात्समुद्भूतौ बिन्दुसर्गोवसानकौ । हंसौ तौ पुम्प्रकृत्याख्यो ह पुमान्प्रकृतिस्तु सः ।५१ अजपा कथिता ताभ्यां जीवोयमुपतिष्ठति । पुरुष स्वाश्रय मत्वा प्रकृतिर्नित्यमोत्मना ।५२ यदा तद्भावप्राप्नोति तदा सोऽहमिसं भवेत् । सकारार्ण तवार्णं लोपयित्वा तत परम् ।५३ सन्धि कुर्यात्पूर्वरूपन्तदासौ प्रणवो भवेत् । परानन्दमयं नित्यंचैतवेक गुणात्मकम् । आत्माभेदस्थितं योगी प्रणव भावयेत्सदा ।५४ आम्नायवाचामतिदूरमाद्यं वेद्यं स्वसंवेद्यगुणेन सन्तः । आत्मानमानन्दरसैकसिन्धुं पश्यन्ति तारात्मकमत्मनिष्ठाः५५
४८४ ] [ श्रीशारदा तिलक सत्यं हेतुविवर्जितं श्रुतिगिरामाद्यं जगत्कारणम् । व्याप्तस्थावरजङ्गमं निरुपमं चैतन्यमन्तर्गतम् । आत्मानं रविवह्निचन्द्रवपुषं तारात्मकं सन्ततम् । नित्यानन्दगुणालयं सुकृतिनः पश्यन्ति रुद्धेन्द्रिया ।५६ मदमस्त भ्रमर की अङ्गना के समान प्रथम ध्वनि होती है । बाँस के छिद्र के पूर्ण होने पर जैसी ध्वनि हुआ करती है उसीके सदृश दूसरी ध्वनि होती है ।४८। फिर घण्टा की ध्वनि के तुल्य ध्वनि होती है, पीछे मेघ के गर्जन के सदृश ध्वनि होती है । इसी प्रकार ने अभ्य'स करने वाले पुरुष को संसार के ध्वान्त (अन्धकार ) का विनाश हो जाया करता है ।४६। हंस के लक्षण वाला अन्यय पहिले ज्ञान उत्पन्न होता है । मनीषियों ने विन्दु और सर्ग को पुम्प्रकृति के स्वरूप वाला बताया है । उन द्वीपों से क्रम से अवसानक विन्दु और सर्ग समुत्पन्न होते हैं । वे दोनों पुम्प्रकृति द्विनाम वाले हंस है । हे पुमान् है सौ प्रकृति है ।५०-५१। ये दोनों अजपा कहो गयी है । फिर यह बीज उपस्थित हुआ करता है । पुरुष को स्वाश्रय मानकर प्रकृति नित्य ही उसी के समाश्रित है यही इन दोनों का सम्बन्ध है ।५२। जिस समय में उस भाव को प्राप्त करता है तब मैं वहीं हूँ ऐसा भास हुआ करता है । प्रकृति और पुरुष के अभेद होने से मैं परमात्मा ही हूँ-इस रीति से यह जीव और ब्रह्म का ऐक्य होता है । अजपा के अभ्यास से इस प्रकार का ऐक्य उद्भूत हुआ करता है । सकारार्ण और प्रशारार्ण को योजित करके इसके पश्चात् सन्धि तथा पूर्वरूप करे तो यह प्रणव हो जाया करता है, यह परानन्दमय और एक जप के गुण से युक्त होता है आत्मा के अभेद में स्थित रहने वाला योगी सदा इस प्रणव की भावना किया करता है ।५४। जो आत्मनिष्ठ पुरुष होते हैं वे सदा प्रणव की भावना किया करते हैं । उस तारात्मक को देखते हैं जो आम्नाय के वचनों से अत्यन्त दूर है, आद्य, वेद्य तथा स्वसंवेद्य गुण से युक्त है और आनन्द रस के सागर आत्मा का दर्शन करते हैं ।५५। अपनी
विश पटल ] [ ४८५ इन्द्रियों को वश में रखने वाले मुकृती पुरुष रवि-चन्द्र और वह्नि के शरीर वाले-निरन्तर तार स्वरूप-नित्यानन्द गुण के निलय आत्मा को देखा करते हैं ।५६। तारस्य सप्तविभवैः परिचीयमानं मानैरगम्यमनिशं श्रुतिमौलिमृग्यम् । सच्चित्समस्तगमनश्वरमच्युतं तत्तं जः परं भजत सान्द्रसुधाम्बुराशिम् ।५७ हिरण्मयं दीप्तमनेकवर्णं त्रिमूर्तिमूलं अनगमादिबीजम् । अंगुष्ठमात्रं पुरुषं भजन्ते चैतन्यमात्रं रविमण्डलस्थ लम् ।५८ सुखदा दातृसुभगा शंकराद्ध शरीरिणी । ग्रन्थपुष्पोपहारेण प्रीता नः पार्वती सदा ।५६ ध्यायन्ति दुग्धाब्धिभुजङ्गभोगे शयानमाद्यं क लासहायम् । प्रफुल्लनेत्राम्बुजनाभं चतुर्मुखेनाश्रितनाभिपद्मम् ।६० द्याम्नायग्रन्थिवचनं घननीलनुद्यच्छी- वत्सकौस्तुभगदाम्बुशङ्ख्चक्रम् । हृत्पुण्डकरीकनिलयं जगदेकमूलमाल लोकयन्ति कृतिनः पुरुषं पुराणम् ।६१ बिन्दोर्नादसमुद्भवः समुदिते नादे जगत्कारणम् । तां तत्वमुखाम्बुजं पुरवितं वर्णात्मकैर्भूर्जजैः । आम्नायडिङ्ग्रचतुष्टयं पुरिरिपोरानन्दमूलं वपुः पायाद्भोमुकुटेन्दुखण्डविगलद्दिव्यामृतौघैः स् ।६२ तार के सप्त विभवों के द्वारा परिचीय मान-प्रमाणों के द्वारा अगम्य-निरन्तर श्रुति शिरोमणि के द्वारा खोजने के योग्य-सत्, चित्
४८६ ] [ श्रीशारदा तिलक समस्त के द्वारा ज्ञान, नश्वर, सान्द्र सुधाम्बु का समूह, अच्युत उस परम तेज का भजन अर्थात् सेवन करो ।५७। हिरण्यमय, देदीप्यमान, अनेक वर्णों वाला, त्रिमूर्ति का मूल, निगम का आदि बीज, चैतन्यमात्र, रविमण्डल में स्थित और अङ्गुष्ठमात्र पुरुष का सेवन किया करते हैं। ।५८। पार्वती देवी जो सुख प्रदान करने वाली है, दाताओं के लिये सुभगा है, भगवान् शङ्कर की अर्द्धाङ्गिनी है अन्य रूपी पुष्पों के उपहार से प्रसन्न होने वाली हैं, वह सर्वदा हम पर कृपा करे ।५९। क्षीरसागर में शेष की शय्या पर शयन करने वाले, सबके आदि रूप, लक्ष्मी के साथ विराजमान, विकसित नेत्र रूपी कमलों वाले, कमल को नाभि में धारण करने वाले तथा ब्रह्मा के द्वारा समाश्रय किया हुआ है नाभि में कमल जिनके ऐसे भगवान् लक्ष्मी नारायण प्रभुका ध्यान करते हैं ।६०। कृती लोग आम्नाय ग्रन्थि के वचन, घन के समान नील वर्ण वाले, श्रीवत्स के चिह्न से संयुत गदा शंख, कमल और चक्र आयुधों के शोभित, हृदय रूपी पुण्डरीक में निलय वाले, इस जगत्के एकमात्र मूल पुराण पुरुष का कृतीजन ही अवलोकन किया करते हैं ।६१। विन्दु से नाद की उत्पत्ति होती है, नाद में ही जगत् का कारण है, वर्णात्मक भूर्जंजों से तत्व मुखाम्बुज पूरित्त है, आम्नाय चतुष्टय अङ्घ्रिघ है। पुर- रिपु भगवान् का आनन्द मूल वपु है। वह वपु जिसके मस्तक में इन्द्र- खण्ड है जिससे विगलित होते हुये दिव्यामृत का समूह है, उससे वह वपु परिप्लुत हो रहा है। ऐसा भगवान् भव का वपु आपकी रक्षा करे ।६२। पिण्ड भवेत्कुण्डलिनी शिवात्मा पद तु हंसःसकलान्तरात्मा । रूपं भवेद्विन्दुरनन्तकान्तिरतीनरूपं शिवसामरस्यम् ।६३ पिण्डादियोगं शिवसामरस्यात्सबीजयोगं प्रवदन्ति सन्तः । शिवेलय नित्यगुणाभियुक्तो निर्बीजयोगं फलनिर्व्यपेक्षम् ।६४
विंश पटल ] [ ४५७ मूलोन्निद्रभुजङ्गराज महिषी यान्तीं सुषुम्नान्तरम् भित्त्वाधारस मूहमाशु विलसत्सौदामिनी सन्निभाम्। व्योमाम्भोजगतेन्दुमण्डलगलद्दिव्यामृतौघप्लुताम् । सम्भाव्य स्वगृहं गतां पुनरिमां सञ्चिन्तयेत्कुण्डलीम्॥६५ हंसं नित्यमनन्तमव्ययगुणं स्वाधारतोनिर्गता । शाक्तः कुण्डलिनी समस्तजननी हस्ते गृहीत्वा च तम् । याता शम्भुनिकेतनं परसुख तेनानुभूय स्वयम् । यान्ती स्वाश्रयमर्ककोटिरुचिरा ध्येया जगन्मोहिनी ॥६६ अव्यक्तं परबिन्दुमु ज्वलरुचि नीत्वा शिवस्यालयम् । शक्तिः कुण्डलिनी गुणत्रयवविद्युल्लतासन्निभा । दानन्दामृतमध्यग पुरभिदं चन्द्रार्ककोटिप्रभम् । सवीक्ष्य स्वपुरं गता भगवती ध्येयाऽनवद्या गुणैः ॥६७ मध्येवर्त्म समीरणाद्वयमिथः सङ्घट्टसंक्षोभजम् । शब्दस्तोममतीत्य तेजसि तडित्कोटिप्रभाभासुरे । डद्यन्तीं समुपास्महे नवजपासिन्दूरसन्ध्यारुणाम् सान्द्रानन्दसुधामयीं परशिवं प्राप्तांपरां देवताम् ॥६८ गमना गमनेषु जांधिकी सा तनुयाद्योगफलानि कुण्डली । मुदिताकुल का मसेनुरेशा भजतां काक्षितकल्पवल्लरी ॥६९